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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 608 of 1098

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Page 608
५९८* मत्स्यपुराण *

| ततः शतेन बाणानां शक्रं विव्याध दानवः।<br>नारायणं च सप्तत्या नवत्या च हुताशनम्॥ १७९<br>दशभिर्मारुतं मूर्ध्नि यमं दशभिरेव च।<br>धनदं चैव सप्तत्या वरुणं च तथाष्टभिः॥ १८०<br>विंशत्या निर्ऋतिं दैत्यः पुनश्चाष्टाभिरेव च।<br>विव्याध पुनरेकैकं दशभिर्दशभिः शरैः॥ १८१<br>तथा च मातलिं दैत्यो विव्याध त्रिभिराशुगः।<br>गरुडं दशभिश्चैव स विव्याध पतत्रिभिः॥ १८२<br>पुनश्च दैत्यो देवानां तिलशो नतपर्वभिः।<br>चकार वर्मजातानि चिच्छेद च धनूंषि तु।<br>ततो विकवचा देवा विधनुष्काः शरैः कृताः॥ १८३ | थे। इसके बाद दानवराज तारकने सौ बाणोंसे इन्द्रको, सत्तर बाणोंसे नारायणको, नब्बे बाणोंसे अग्निको, दस बाणोंसे वायुके मस्तकको, दस बाणोंसे यमको, सत्तर बाणोंसे कुबेरको, आठ बाणोंसे वरुणको तथा अट्ठाईस बाणोंसे निर्ऋतिको घायल कर दिया। फिर उस दैत्यने प्रत्येकको पुनः दस-दस बाणोंसे बींध दिया। तत्पश्चात् उस दैत्यने तीन बाणोंसे मातलिपर और दस बाणोंसे गरुड़पर गहरा आघात किया तथा झुकी हुई गाँठोंवाले बाणोंके प्रहारसे देवताओंके कवचोंको काटकर तिल-जैसा बना दिया और उनके धनुषोंको भी काट दिया। इस प्रकार बाणोंके आघातसे देवगण कवच और धनुषसे रहित कर दिये गये॥ १७९-१८३॥ |
| अथान्यानि चापानि तस्मिन् सरोषा<br>रणे लोकपाला गृहीत्वा समंतात्।<br>शरैरक्षयैर्दानवेन्द्रं ततक्षु-<br>स्तदा दानवोऽमर्षसंरक्तनेत्रः ॥ १८४<br>शरानग्निकल्पान् ववर्षामराणां<br>ततो बाणमादाय कल्पानलाभम्।<br>जघानोरसि क्षिप्रमिन्द्रं सुबाहुं<br>महेन्द्रोऽप्यकम्पद् रथोपस्थ एव॥ १८५<br>विलोक्यन्तरिक्षे सहस्त्रार्कबिम्बं<br>पुनर्दानवो विष्णुमुद्भूतवीर्यम्।<br>शराभ्यां जघानांसमूले सलीलं<br>ततः केशवस्यापतच्छाङ्गमग्रे॥ १८६<br>ततस्तारकः प्रेतनाथं पृषत्कै-<br>र्वसुं तस्य सव्ये स्मरन् क्षुद्रभावम्।<br>शरैरग्निकल्पैर्जलेशस्य कायं<br>रणेऽशोषयद् दुर्जयो दैत्यराजः॥ १८७<br>शरैरग्निकल्पैश्चकाराशु दैत्य-<br>स्तथा राक्षसान् भीतभीतान् दिशासु।<br>पृषत्कैश्च रूक्षैर्विकारप्रयुक्तं<br>चकारानिलं लीलयैवासुरेशः॥ १८८ | तदनन्तर उस युद्धमें क्रोधसे भरे हुए लोकपालगण दूसरा धनुष लेकर चारों ओरसे अमोघ बाणोंद्वारा दानवेन्द्र तारकको घायल करने लगे। तब उस दानवराजके नेत्र अमर्षसे लाल हो गये। फिर तो वह देवताओंपर अग्नि-सदृश दाहक बाणोंकी वर्षा करने लगा। पुनः उसने प्रलयकालीन अग्निके समान एक विकराल बाण लेकर बड़ी शीघ्रतासे सुन्दर भुजावाले इन्द्रकी छातीपर प्रहार किया। उस आघातसे रथके पिछले भागमें बैठे हुए महेन्द्र भी काँप उठे। पुनः अन्तरिक्षमें हजारों सूर्य-बिम्बकी तरह उदीप्त होते हुए अद्भुत पराक्रमी विष्णुको देखकर उस दानवने अनायास ही दो बाणोंसे उनके कंधोंके मूलभागपर ऐसी गहरी चोट की, जिससे केशवका शार्ङ्गधनुष उनके आगे गिर पड़ा। तत्पश्चात् अजेय दैत्यराज तारकने रणभूमिमें प्रेतनाथ यम तथा उनके दाहिने भागमें स्थित वसुको कुछ भी न गिनते हुए उन्हें बाणोंसे बींध दिया और अग्नि-सदृश दाहक बाणोंसे वरुणके शरीरको सुखा दिया तथा शीघ्र ही अग्नि-सदृश बाणोंसे राक्षसोंको भयभीत कर दिशाओंमें खदेड़ दिया। इसी प्रकार उस असुरराजने खेल-ही-खेलमें रूखे बाणोंके आघातसे वायुदेवको भी विकृत कर दिया। |