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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 607 of 1098

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Page 607
* अध्याय १५३ *५९७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सर्वायुधमसम्बाधं विचित्ररचनोज्ज्वलम्।<br>तं रथं देवराजस्य परिवार्य समंततः॥ १६४<br>दंशिता लोकपालास्तु तस्थुः सगरुडध्वजाः।<br>ततश्चचाल वसुधा ततो रूक्षो मरुद् ववौ॥ १६५<br>ततोऽम्बुधय उद्भूतास्ततो नष्टा रविप्रभा।<br>ततस्तमः समुद्भूतं नातोऽदृश्यन्त तारकाः॥ १६६<br>ततो जज्वलुरस्त्राणि ततोऽकम्पत वाहिनी।<br>एकतस्तारको दैत्यः सुरसङ्घस्तु चैकतः॥ १६७<br>लोकावसादमकत्र जगत्पालनमेकतः।<br>चराचराणि भूतानि सुरासुरविभेदतः॥ १६८<br>तद् द्विधाप्येकतां यातं ददृशुः प्रेक्षका इव।<br>यद्वस्तु किंचिल्लोकेषु त्रिषु सत्तास्वरूपकम्।<br>तत्तत्रादृश्यदखिलं खिलीभूतविभूतिकम्॥ १६९<br>अस्त्राणि तेजांसि धनानि धैर्यं<br>सेनाबलं वीर्यपराक्रमौ च।<br>सत्त्वौजसां तन्निकरं बभूव<br>सुरासुराणां तपसो बलेन॥ १७०<br>अथाभिमुखमायान्तं नवभिर्नतपर्वभिः।<br>बाणैरनलकल्पाग्रैर्बिभिदुस्तारकं हृदि॥ १७१<br>स तानचिन्त्य दैत्येन्द्रः सुरबाणान् गतान् हृदि।<br>नवभिर्नवभिर्बाणैः सुरान् विव्याध दानवः॥ १७२<br>जगद्धरणसम्भूतैः शल्यैरिव पुरःसरैः।<br>ततोऽच्छिन्नं शरव्रातं संग्रामे मुमुचुः सुराः॥ १७३<br>अनन्तरं च कान्तानामश्रुपातमिवानिशम्।<br>तदप्राप्तं वियत्येव नाशयामास दानवः॥ १७४<br>शौर्यथा कुचरितः प्रख्यातं परमागतम्।<br>सुनिर्मलं क्रमायातं कुपुत्रः स्वं महाकुलम्॥ १७५वह सभी प्रकारके अस्त्रोंसे भरा हुआ था तथा उसमें उज्ज्वल रंगकी विचित्र रचना की गयी थी। देवराजके उस रथको गरुडध्वज भगवान् विष्णुसहित सभी लोकपाल कवचसे सुसज्जित हो चारों ओरसे घेरकर खड़े थे॥ १६५-१६४ १/२ ॥<br><br>तदनन्तर पृथिवी काँपने लगी। रूखी हवा चलने लगी। समुद्रोंमें ज्वार उठने लगा। सूर्यकी कान्ति नष्ट हो गयी। चारों ओर घना अन्धकार छा गया, जिससे ताराओंका दीखना बंद हो गया। अकस्मात् अस्त्र प्रकाशित हो उठे और सेना काँपने लगी। एक ओर दैत्यराज तारक था तो दूसरी ओर देवताओंका समूह डटा था। एक ओर लोकोंका विनाश था तो दूसरी ओर जगत्का पालन। इस प्रकार वहाँ सुर और असुरके भेदसे सभी चराचर प्राणी उपस्थित थे। वे दो भागोंमें विभक्त होनेपर भी दर्शकोंकी भाँति एकीभूत-से दिखायी पड़ रहे थे। तीनों लोकोंमें जितनी कुछ सत्तासम्पन्न वस्तुएँ थीं, वे सब-की-सब अपने एकत्र ऐश्वर्यसहित वहाँ दीख रही थीं। बल एवं पराक्रमशाली देवताओं और असुरोंकी तपस्याके बलसे वहाँ तेजस्वी अस्त्र, धन, धैर्य, सेनाबल, साहस और पराक्रमका जमघट लगा हुआ था। तत्पश्चात् तारकको सम्मुख धावा करते हुए देखकर इन्द्रादि देवगणोंने ऐसे नौ बाणोंसे, जिनकी गाँठें झुकी हुई थीं तथा जिनके अग्रभाग अग्नि-सरीखे तेजस्वी थे, तारकके हृदयको विदीर्ण कर दिया। तब दैत्यराज तारकने अपने हृदयमें गड़े हुए देवताओंके उन बाणोंकी कुछ भी परवा न कर प्रत्येक देवताको क्रमशः ऐसे नौ-नौ बाणोंसे, जो जगत्का विनाश करनेमें समर्थ तथा अग्रभागमें कीलकी भाँति नुकीले थे, बींध दिया। तदनन्तर देवगण संग्रामभूमिमें वियोगिनी स्त्रीके दिन-रात गिरते हुए अश्रुपातकी तरह लगातार बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे, किंतु दानवराज तारकने उन बाण-वृष्टिको अपने पास पहुँचनेसे पूर्व आकाशमें ही अपने बाणोंके प्रहारसे इस प्रकार नष्ट कर दिया, जैसे कुपुत्र दुराचरणोंसे अपने परम्परागत परम पावन, सुनिर्मल एवं प्रतिष्ठित महान् कुलको नष्ट कर देता है॥ १६५-१७५॥
ततो निवार्य तद् बाणजालं सुरभुजेरितम्।<br>बाणैर्व्योम दिशः पृथ्वीं पूरयामास दानवः॥ १७६<br><br>चिच्छेद पुच्छदेशेषु स्वके स्थाने च लाघवात्।<br>बाणजालैः सुतीक्ष्णाग्रैः कङ्कबर्हिणवाजितैः॥ १७७<br><br>कर्णान्तकृष्टैर्विमलैः सुवर्णरजतोज्ज्वलैः।<br>शास्त्रार्थैः संशयप्राप्तान् यथार्थान् वै विकल्पितैः॥ १७८तत्पश्चात् दानवराजने देवताओंकी भुजाओंसे छोड़े गये उस बाणसमूहका निवारण कर अपने बाणोंसे आकाश, पृथ्वी और दिशाओंको भर दिया। तदुपरान्त उसने अपने स्थानपर स्थित रहते हुए ही हाथकी फुर्तीसे छोड़े गये बाणसमूहोंद्वारा देवताओंके बाणोंके पुच्छभागको उसी प्रकार काट दिया, जैसे विकल्पित शास्त्रार्थद्वारा संशयग्रस्त यथार्थ तत्त्व कट जाते हैं। उसके वे बाण अत्यन्त निर्मल, सुवर्ण और चाँदीके समान उज्ज्वल और अत्यन्त तीखे नोकवाले थे, उनमें कंक और मोरके पंख लगे हुए थे तथा वे धनुषको कानतक खींचकर छोड़े गये