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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 609 of 1098

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Page 609
* अध्याय १५३ *५९९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
क्षणाल्लब्धचित्ताः स्वयं विष्णुशक्रा-<br>नलाद्याः सुसंहत्य तीक्ष्णैः पृषत्कैः।<br>प्रचक्रुः प्रचण्डेन दैत्येन सार्धं<br>महासङ्गरं सङ्गरग्रासकल्पम्॥ १८९<br>अथानम्य चापं हरीस्तीक्ष्णबाणै-<br>र्हनत्सारथिं दैत्यराजस्य हृद्यम्।<br>ध्वजं धूमकेतुः किरीटं महेन्द्रो<br>धनेशो धनुः काञ्चनानद्धपृष्ठम्।<br>यमो बाहुदण्डं रथाङ्गानि वायु-<br>र्निशाचारिणामीश्वरस्यापि वर्म॥ १९०थोड़ी देर बाद चेतना प्राप्त होनेपर स्वयं भगवान् विष्णु, इन्द्र, अग्नि आदि देवगण सुसंगठित होकर तीखे बाणोंद्वारा उस प्रचण्ड दैत्यके साथ विषके ग्रासके समान भीषण संग्राम करने लगे। उस समय श्रीहरिने अपने धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाकर तीखे बाणोंद्वारा दैत्यराजके प्रिय सारथिको यमलोकका पथिक बना दिया। पुनः अग्निने उसके ध्वजको, महेन्द्रने किरीटको, कुबेरने पृष्ठभागपर स्वर्णजटित धनुषको, यमने भुजाओंको और वायुने रथाङ्गों तथा उस असुरराजके कवचको भी काट गिराया॥ १८४-१९०॥
दृष्ट्वा तद् युद्धममरैरकृत्रिमपराक्रमम्।<br>दैत्यनाथः कृतं संख्ये स्वबाहुयुगबान्धवः॥ १९१<br>मुमोच मुद्गरं भीमं सहस्राक्षाय सङ्गरे।<br>दृष्ट्वा मुद्गरमायान्तमनिवार्यमथाम्बरे॥ १९२<br>रथादाप्लुत्य धरणीमगमत् पाकशासनः।<br>मुद्गरोऽपि रथोपस्थे पपात परुषस्वनः॥ १९३<br>स रथं चूर्णयामास न ममार च मातलिः।<br>गृहीत्वा पट्टिशं दैत्यो जघानोरसि केशवम्॥ १९४<br>स्कन्धे गरुत्मतः सोऽपि निषसाद विचेतनः।<br>खड्गेन राक्षसेन्द्रस्य निचकर्त च वाहनम्॥ १९५<br>यमं च पातयामास भूमौ दैत्यो भुशुण्डिना।<br>वह्निं च भिन्दिपालेन ताडयामास मूर्धनि॥ १९६<br>वायुं च दोर्भ्यामुत्क्षिप्य पातयामास भूतले।<br>धनेशं च धनुष्कोट्या कुट्टयामास कोपनः॥ १९७<br>ततो देवनिकायानामेकैकं समरे ततः।<br>जघानास्त्रैरसंख्येयैर्दैत्येन्द्रोऽमितविक्रमः ॥ १९८तदनन्तर अपनी दोनों भुजाएँ ही जिसकी सहायक थीं, उस दैत्यराज तारकने युद्धस्थलमें देवताओंद्वारा किये गये उस युद्ध और उनके सत्य पराक्रमको देखकर रणभूमिमें इन्द्रके ऊपर अपना भयंकर मुद्गर चला दिया। उस अनिवार्य मुद्गरको आकाशमार्गसे आते हुए देखकर इन्द्र रथसे कूदकर पृथ्वीपर खड़े हो गये और वह मुद्गर कठोर शब्द करता हुआ रथके पिछले भागपर जा गिरा। उसने रथको तो चूर्ण कर दिया, पर मातलिके प्राण बच गये। फिर उस दैत्यने पट्टिश लेकर केशवकी छातीपर आघात किया, जिससे वे भी चेतनारहित होकर गरुड़के कंधेपर लुढ़क गये। पुनः उस दैत्यने तलवारसे राक्षसराज निर्ऋतिके वाहनको काट डाला, भुशुण्डिके प्रहारसे यमराजको धराशायी कर दिया, भिन्दिपालसे अग्निके मस्तकपर चोट की, वायुको दोनों हाथोंसे उठाकर भूतलपर पटक दिया और कुपित होकर कुबेरको धनुषके सिरेसे कूट डाला। तदुपरान्त उस अनुपम पराक्रमी दैत्यराजने समर भूमिमें देवसमूहोंमेंसे प्रत्येकपर असंख्य अस्त्रोंसे प्रहार किया॥ १९१-१९८॥
लब्धसंज्ञः क्षणाद् विष्णुश्चक्रं जग्राह दुर्धरम्।<br>दानवेन्द्रवसासिक्तं पिशिताशनकोन्मुखम्॥ १९९<br>मुमोच दानवेन्द्रस्य दृढं वक्षसि केशवः।<br>पपात चक्रं दैत्यस्य हृदये भास्करद्युति॥ २००<br>व्यशीर्यत ततः काये नीलोत्पलमिवाश्मनि।<br>ततो वज्रं महेन्द्रस्तु प्रमुमोचार्चितं चिरम्॥ २०१तत्पश्चात् क्षणभर बाद चेतना प्राप्त होनेपर भगवान् विष्णुने अपने दुर्धर्ष चक्रको, जो दानवेन्द्रोंकी मज्जासे अभिषिक्त तथा मांसभोजी असुरोंका संहार करनेके लिये उन्मुख था, हाथमें लिया। फिर केशवने उसे सुदृढ़रूपसे दानवराजके वक्षःस्थलपर छोड़ दिया। वह सूर्यके समान तेजस्वी चक्र दैत्यके हृदयपर जा गिरा, किंतु उसके शरीरपर गिरते ही वह इस प्रकार टूट-फूट गया, जैसे पत्थरपर गिरा हुआ नीला कमल छिन्न-भिन्न हो जाता है।