Skip to content
SarvaKosh
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 606 of 1098

Read in context
Page 606

५९६ * मत्स्यपुराण *


स मन्त्रमुच्चार्य यतान्तराशयो<br>वधाय दैत्यस्य धियाभिसंध्य तु।<br>विकृष्य कर्णान्तमकुण्ठदीधितिं<br>मुमोच वीक्ष्याम्बरमार्गमुन्मुखः॥ १५२<br>अथासुरः प्रेक्ष्य महास्त्रमाहितं<br>विहाय मायामवनौ व्यतिष्ठत।<br>प्रवेपमानेण मुखेन शुष्यता<br>बलेन गात्रेण च सम्भ्रमाकुलः॥ १५३<br>ततस्तु तस्यास्त्रवराभिमन्त्रितः<br>शरोऽर्धचन्द्रप्रतिमो महारणो।<br>पुरन्दरस्यासनबन्धुतां गतो<br>नवार्कबिम्बं वपुषा विडम्बयन्॥ १५४<br>किरीटकोटिस्फुटकान्तिसंकटं<br>सुगन्धिनानाकुसुमाधिवासितम्।<br>प्रकीर्णधूमज्वलननाभमूर्धजं<br>पपात जम्भस्य शिरः सकुण्डलम्॥ १५५मन्त्रका उच्चारण करते हुए बुद्धिद्वारा दैत्यके वधकी प्रतिज्ञा की और धनुषको कानतक खींचकर ऊपर मुख करके आकाशमार्गको देखते हुए उस परम तेजस्वी बाणको छोड़ दिया। तदुपरान्त जब जम्भासुरने उस महान् अस्त्रको छोड़ते हुए देखा, तब वह अपनी मायाको त्यागकर भूतलपर स्थित हो गया। उस समय उसका शरीर काँप रहा था, मुख सूख गया था और बल क्षीण हो गया था। इस प्रकार वह अत्यन्त व्याकुल हो उठा। इसी बीच ब्रह्मास्त्रसे अभिमन्त्रित हुआ वह अर्धचन्द्राकार बाण उस महासमरमें इन्द्रके धनुषसे छूटकर अपने शरीरसे उदयकालीन सूर्यमण्डलकी विडम्बना करता हुआ जम्भासुरके गलेपर जा गिरा। उसके आघातसे जम्भासुरका कुण्डलमण्डित सिर, जो किरीटके सिरेसे निकलती हुई कान्तिसे व्याप्त, नाना प्रकारके सुगन्धित पुष्पोंसे अधिवासित और बिखरे हुए धूमसे युक्त अग्निकी-सी कान्तिवाले केशोंसे सुशोभित था, भूतलपर गिर पड़ा॥ १५१–१५५॥
तस्मिन् विनिहते जम्भे दानवेन्द्राः पराङ्मुखाः।<br>ततस्ते भग्नसंकल्पाः प्रययुर्यत्र तारकः॥ १५६इस प्रकार उस जम्भासुरके मारे जानेपर सभी दानवेन्द्र युद्धसे विमुख हो गये। उनके संकल्प भग्न हो गये, तब वे तारकके पास चले गये।
तांस्तु त्रस्तान् समालोक्य श्रुत्वा रोषमगात्परम्।<br>स जम्भदानवेन्द्रं तु सुरै रणमुखे हतम्॥ १५७उन्हें भयभीत देखकर तथा युद्धके मुहानेपर दानवराज जम्भको देवताओंद्वारा मारा गया सुनकर तारक परम क्रुद्ध हो उठा।
सावलेपं ससंरम्भं सगर्वं सपराक्रमम्।<br>साविष्कारमनाकारं तारको भावमाविशत्॥ १५८उस समय तारकमें अभिमान, क्रोध, गर्व, पराक्रम, आविष्कार और अनाकार आदि भाव लक्षित हो रहे थे।
स जैत्रं रथमास्थाय सहस्रेण गरुत्मताम्।<br>संरम्भाद् दानवेन्द्रस्तु सुरै रणमुखे गतः॥ १५९तब दानवराज तारक हजारों गरुडोंके समान वेगशाली एवं जयशील रथपर सवार हो क्रोधपूर्वक रणके मुहानेपर देवताओंसे युद्ध करनेके लिये चला।
सर्वायुधपरिष्कारः सर्वास्त्रपरिरक्षितः।<br>त्रैलोक्यऋद्धिसम्पन्नः सुविस्तृतमहाननः॥ १६०उस समय वह सभी प्रकारके अस्त्रोंसे सुसज्जित, सभी प्रकारके अस्त्रोंसे पूर्णतया सुरक्षित, त्रिलोकीके ऐश्वर्यसे सम्पन्न तथा विस्तृत एवं विशाल मुखसे सुशोभित था।
रणायाभ्यपतत् तूर्णं सैन्येन महतावृत्तः।<br>जम्भास्त्रक्षतसर्वाङ्गं त्यक्त्वैरावतदन्तिनम्॥ १६१वह विशाल सेनाके साथ शीघ्र ही युद्धके लिये आ डटा। तब जिसके सारे अङ्ग जम्भासुरके अस्त्रसे क्षत-विक्षत हो गये थे, उस गजराज ऐरावतको छोड़कर इन्द्र रथपर सवार हो गये।
सजं मातलिना गुप्तं रथमिन्द्रस्य तेजसा।<br>तप्तहेमपरिष्कारं महारत्नसमन्वितम्॥ १६२वह रथ इन्द्रके तेजसे सुरक्षित और मातलिद्वारा सजाया गया था। वह तपाये हुए स्वर्णसे विभूषित था। उसमें बहुमूल्य रत्न जड़े हुए थे।
चतुर्योजनविस्तीर्णं सिद्धसङ्घपरिष्कृतम्।<br>गन्धर्वकिन्नरोद्गीतमप्सरोनृत्यसंकुलम् ॥ १६३वह चार योजन विस्तृत था। उसपर सिद्धगण बैठे हुए थे। उसमें गन्धर्व और किंनर गान कर रहे थे तथा अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं।