Skip to content
SarvaKosh
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 605 of 1098

Read in context
Page 605
* अध्याय १५३ *५९५

| मृतस्य केशवासितं रसं प्रगृह्य पाणिना<br>प्रिया विमुक्तजीवितं समानयासुगासवम्।<br>न पथ्यतां प्रयाति मे गतं श्मशानगोचरं<br>नरस्य तज्जहात्यसौ प्रशस्य किन्नराननम्॥ १४२<br>स नाग एष नो भयं दधाति मुक्तजीवितो<br>न दानवस्य शक्यते मया तदेकयाऽऽननम्।<br>इति प्रियाय वल्लभा वदन्ति यक्षयोषितः<br>परे कपालपाणयः पिशाचयक्षरक्षसाः॥ १४३<br>वदन्ति देहि देहि मे ममातिभक्ष्यचारिणः<br>परेऽवतीर्य शोणितापगासु धौतमूर्तयः।<br>पितॄन् प्रतर्प्य देवताः समर्पयन्ति चामिषै-<br>र्गजोडुपे सुसंस्थितास्तरन्ति शोणितं ह्रदम्॥ १४४<br>इति प्रगाढसङ्कटे सुरासुरे सुसङ्गरे<br>भयं समुज्झ्य दुर्जया भटाः स्फुटन्ति मानिनः॥ १४५ | एक पिशाचिनी मृतकके रुधिरको, जिसमें बाल पड़े हुए थे, हाथमें लेकर अपने पतिसे कह रही थी—'मेरे लिये किसी दूसरे मरे हुए जीवका रुधिररूपी आसव ले आओ। इस श्मशानभूमिमें पड़ा हुआ कोई भी शव मेरे लिये पथ्य नहीं हो सकता।' ऐसा कहकर उसने किंनरके मुखकी प्रशंसा करके मनुष्यकी लाशको छोड़ दिया। (कोई कह रही थी—) वह हाथी यद्यपि मर चुका है, तथापि हमलोगोंको भयभीत कर रहा है। (कोई कह रही थी—) मैं अकेली दानवके उस मुखको नहीं खा सकती। इस प्रकार यक्षोंकी प्रियतमा पत्नियाँ अपने पतियोंसे कह रही थीं। अन्यान्य पिशाच, यक्ष और राक्षस हाथमें कपाल लेकर कह रहे थे—'अरे मुझसे भी अधिक खानेवाले पिशाचो! मुझे भी कुछ दे दो।' दूसरे कुछ पिशाच रुधिरसे भरी हुई नदियोंमें स्नान करके पवित्र हो पितरों और देवताओंका तर्पण करनेके बाद मांसद्वारा उनकी अर्चना कर रहे थे। कुछ हाथीरूपी नौकापर बैठकर खूनसे भरे हुए कुण्डोंको पार कर रहे थे। इस प्रकार घोर संकटसे भरे हुए उस देवासुर-संग्राममें दुर्जय योद्धा निर्भय होकर लोहा ले रहे थे॥ १४१—१४५॥ |
| ततः शक्रो धनेशश्च वरुणः पवनोऽनलः।<br>यमोऽपि निर्ऋतिश्चापि दिव्यास्त्राणि महाबलाः॥ १४६<br>आकाशे मुमुचुः सर्वे दानवानभिसंध्य ते।<br>अस्त्राणि व्यर्थतां जग्मुर्देवानां दानवान् प्रति॥ १४७<br>संरम्भेणाप्ययुध्यन्त संहतास्तुमुलेन च।<br>गतिं न विविदुश्चापि श्रान्ता दैत्यस्य देवताः॥ १४८<br>दैत्यास्त्रभिन्नसर्वाङ्गा ह्यकिंचित्करतां गताः।<br>परस्परं व्यलीयन्त गावः शीतार्दिता इव॥ १४९<br>तदवस्थान् हरिर्दृष्ट्वा देवाञ्छक्रमुवाच ह।<br>ब्रह्मास्त्रं स्मर देवेन्द्र यस्यावध्यो न विद्यते।<br>विष्णुना चोदितः शक्रः सस्मरास्त्रं महौजसम्॥ १५० | तदनन्तर महाबली इन्द्र, कुबेर, वरुण, वायु, अग्नि, यम और निर्ऋति—इन सभी लोगोंने आकाशमें दानवोंको लक्ष्य करके दिव्यास्त्रोंका प्रहार करने लगे, किंतु दानवोंके प्रति छोड़े गये देवताओंके वे सभी अस्त्र व्यर्थ हो गये। यद्यपि देवगण संगठित होकर अत्यन्त क्रोधसे तुमुल युद्ध कर रहे थे, तथापि वे उस दैत्यकी गतिको न समझ सके। उस समय वे थकावटसे चूर हो गये थे तथा उनके सारे अङ्ग दैत्यके अस्त्रोंसे विदीर्ण हो गये थे, अतः वे किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये। तब वे शीतसे पीड़ित हुई गौओंकी तरह परस्पर एक-दूसरेके पीछे छिपने लगे। देवताओंको ऐसी दशामें पड़ा हुआ देखकर श्रीहरिने इन्द्रसे कहा—'देवेन्द्र! अब आप उस ब्रह्मास्त्रका स्मरण कीजिये, जिसके लिये कोई अवध्य है ही नहीं अर्थात् जो सभीका वध कर सकता है।' इस प्रकार विष्णुद्वारा प्रेरित किये जानेपर इन्द्रने उस महान् ओजस्वी अस्त्रका स्मरण किया॥ १४६—१५०॥ |
| सम्पूजितं नित्यमरातिनाशनं<br>    समाहितं बाणममित्रघातने।<br>धनुष्यजय्ये विनियोज्य बुद्धिमा-<br>    नभूत् ततो मन्त्रसमाधिमानसः॥ १५१ | तदनन्तर बुद्धिमान् इन्द्रने अपने मनको मन्त्र-समाधिमें लीन कर दिया। तत्पश्चात् उन्होंने इन्द्रियोंको वशमें करके नित्य पूजित होनेवाले शत्रुसंहारक बाणको अपने शत्रुविनाशक अजेय धनुषपर रखकर |