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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 604 of 1098

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Page 604

५९४ * मत्स्यपुराण *

श्लोकअर्थ
कुठारान् सह खड्गैश्च भिन्दिपालानयोगुडान्।<br>ववर्ष दानवो रौद्रो ह्यबन्ध्यानक्षयानपि॥ १३३<br>तैरस्त्रैर्दानवैर्मुक्तैर्देवानीकेषु भीषणैः।<br>बाहुभिर्धरणिः पूर्णा शिरोभिश्च सकुण्डलैः॥ १३४<br>ऊरुभिर्गजहस्ताभैः करीन्द्रैर्वाचलोपमैः।<br>भग्नेषादण्डचक्राक्षै रथैः सारथिभिः सह॥ १३५<br>दुःसंचाराभवत् पृथ्वी मांसशोणितकर्दमा।<br>रुधिरौघह्रदावर्ता शवराशिशिलोच्चयैः॥ १३६मुद्गर, कुठार, तलवार, भिन्दिपाल और लोहेके गुटकोंकी वर्षा करने लगा। ये सभी अस्त्र अमोघ और अविनाशी थे। देवसेनाओंपर दानवोंद्वारा छोड़े गये उन भीषण अस्त्रोंके प्रहारसे कटी हुई भुजाओं, कुण्डलमण्डित मस्तकों, हाथियोंके शुण्डादण्डसरीखे ऊरुओं, पर्वतके समान गजराजों तथा टूटे हुए हरसे, पहिये, जुए और सारथियोंसहित रथोंसे वहाँकी पृथ्वी पट गयी। वहाँ मांस और रक्तकी कीचड़ जम गयी, रक्तसे बड़े-बड़े गड्ढे भर गये थे, जिसमें लहरें उठ रही थीं और लाशोंकी राशि ऊँची शिलाओं-जैसी दीख रही थी, इस कारण वहाँकी भूमि अगम्य हो गयी थी॥ १२७-१३६॥
कबन्धनृत्यसंकुले स्रवद्वसास्रकर्दमे<br>जगत्त्योपसंहृतौ समे समस्तदेहिनाम्।<br>शृगालगृध्रवायसाः परं प्रमोदमदधुः<br>क्वचिद्विकृष्टलोचनः शवस्य रौति वायसः॥ १३७<br>विकृष्टपीवरान्त्रकाः प्रयान्ति जम्बुकाः क्वचित्<br>क्वचित्स्थितोऽतिभीषणः स्वचञ्चुचर्वितो बकः।<br>मृतस्य मांसमाहरञ्छ्वजातयश्च संस्थिताः<br>क्वचिद् वृको गजासृजं पपौ निलीयतान्त्रतः॥ १३८<br>क्वचित्तुरङ्गमण्डली विकृष्यते श्वजातिभिः<br>क्वचित् पिशाचजातकैः प्रपीतशोणितासवैः।<br>स्वकामिनीयुतैर्द्रुतं प्रमोदमत्तसम्भ्रमै-<br>ममेतदानयाननं खुरोऽयमस्तु मे प्रियः॥ १३९<br>करोऽयमब्जसन्निभो ममास्तु कर्णपूरकः<br>सरोषमीक्षतेऽपरा वपां विना प्रियं तदा।<br>परा प्रिया ह्यपाययद्गतोष्णशोणितासवं<br>विकृष्य शवचम तत्प्रबद्धसान्द्रपल्लवम्॥ १४०उस युद्धभूमिमें यूथ-के-यूथ कबन्ध नृत्य कर रहे थे। उनके शरीरसे बहती हुई मज्जा और रक्तकी कीचड़ जम गयी थी। वह समस्त प्राणियोंके लिये त्रिलोकीके उपसंहारके समान दीख रही थी। उसमें सियार, गीध और कौवे परम प्रसन्नताका अनुभव कर रहे थे। कहीं कौवा लाशकी आँखको नोचता हुआ उच्च स्वरसे बोल रहा था। कहीं शृगाल मोटी-मोटी अँतड़ियोंको खींचते हुए भाग रहे थे। कहीं अपनी चोंचसे मांसको चबाता हुआ अत्यन्त भयानक बगुला बैठा हुआ था। कहीं विभिन्न जातिके कुत्ते मरे हुए वीरकी लाशसे मांस खींच रहे थे। कहीं अँतड़ीमें छिपा हुआ भेड़िया गजराजका खून पी रहा था। कहीं विभिन्न जातिवाले कुत्ते घोड़ोंकी लाशोंको खींच रहे थे। कहीं रुधिररूप आसवका पान करनेवाले पिशाच-जातिके लोग अपनी पत्नियोंके साथ प्रमोदसे उन्मत्त हो रहे थे। (कोई स्त्री अपने पतिसे कह रही थी—) मेरे लिये वह मुख ले आओ। (कोई कह रही थी—) मेरे लिये वह खुर परम प्रिय है। (कोई कह रही थी—) यह कमल-सदृश हथेली मेरे लिये कर्णपूरका काम देगी। दूसरी स्त्री उस समय पतिके निकट रहनेके कारण क्रोधपूर्वक चर्बीकी ओर देख रही थी। दूसरी पिशाचिनी शवके चमड़ेको फाड़कर बनाये गये हरे पत्तेके दोनेमें गरमागरम रुधिररूप आसव रखकर अपने पतिको पिला रही थी॥ १३७-१४०॥
चकार यक्षकामिनी तरुं कुठारपाटितं<br>गजस्य दन्तमात्मजं प्रगृह्य कुम्भसम्पुटम्।<br>विपाट्य मौक्तिकं परं प्रियप्रसादमिच्छते<br>समांसशोणितासवं पपुश्च यक्षराक्षसाः॥ १४१फिर किसी यक्षपत्नीने वृक्षको कुठारसे काटकर गिरा दिया और गजराजके दाँतको हाथमें लेकर उससे गण्डस्थलको फोड़कर गजमुक्ता निकाल ली। फिर उससे वह अपने पतिको प्रसन्न करनेकी इच्छा करने लगी। उस समय यक्षों और राक्षसोंके समूह मांस एवं रुधिरसहित आसवका पान कर रहे थे।