मत्स्य महापुराण

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| ५६६ | * मत्स्यपुराण * |
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| व्यर्थीकृत्य तु तान् सर्वनायुधान् दैत्यवक्षसि।<br>प्रस्फुरन्ती पपातोग्रा महोल्केवाद्रिकन्दरे॥ ७४<br><br>स तयाभिहतो गाढं पपात रथकूबरे।<br>स्रोतोभिश्चास्य रुधिरं सुस्राव गतचेतसः॥ ७५ | कर रहा था तथापि चमकती हुई वह भयंकर गदा उन सभी आयुधोंको विफल कर जम्भके वक्षःस्थलपर उसी प्रकार गिरी, मानो पर्वतकी कन्दरामें विशाल उल्का आ गिरी हो। उस गदाके आघातसे अत्यन्त घायल हुआ जम्भ रथके कूबरपर गिर पड़ा। उसके शरीरके छिद्रोंसे खूनकी धारा बहने लगी, जिससे वह चेतनारहित हो गया॥ ७२—७५॥ |
| जम्भं तु निहतं मत्वा कुजम्भो भैरवस्वनः।<br>धनाधिपस्य संक्रुद्धो वाक्येनातीव कोपितः॥ ७६<br><br>चक्रे बाणमयं जालं दिक्षु यक्षाधिपस्य तु।<br>चिच्छेद बाणजालं तदर्धचन्द्रैः शितैस्ततः॥ ७७<br><br>मुमोच शरवृष्टिं तु तस्मै यक्षाधिपो बली।<br>स तं दैत्यः शरव्रातं चिच्छेद निशितैः शरैः॥ ७८<br><br>व्यर्थीकृतां तु तां दृष्ट्वा शरवृष्टिं धनाधिपः।<br>शक्तिं जग्राह दुर्धर्षां हेमघण्टाट्टहासिनीम्॥ ७९<br><br>बाहुना रत्नकेयूरकान्तिसन्नाहनासिना।<br>स तां निरूप्य वेगेन कुजम्भाय मुमोच ह॥ ८०<br><br>सा कुजम्भस्य हृदयं दारयामास दारुणम्।<br>वित्तेहा स्वल्पसत्त्वस्य पुरुषस्येव भाविता॥ ८१<br><br>अथास्य हृदयं भित्त्वा जगाम धरणीतलम्।<br>ततो मुहूर्तादस्वस्थो दानवो दारुणाकृतिः॥ ८२<br><br>जग्राह पट्टिशं दैत्यः प्रांशुं शितशिलीमुखम्।<br>स तेन पट्टिशेनाजौ धनदस्य स्तनान्तरम्॥ ८३<br><br>वाक्येन तीक्ष्णरूपेण मर्मान्तरविसर्पिणा।<br>निर्बिभेदाभिजातस्य हृदयं दुर्जनो यथा॥ ८४<br><br>तेन पट्टिशघातेन धनेशः परिमूर्च्छितः।<br>निपपात रथोपस्थे जर्जरो धूर्वहो यथा॥ ८५ | जम्भको मरा हुआ समझकर भयंकर गर्जना करनेवाला क्रोधी कुजम्भ कुबेरके वाक्यसे अत्यन्त कुपित हो उठा। उसने यक्षराजके चारों ओर बाणोंका जाल बिछा दिया। तदनन्तर बलवान् यक्षराजने तीखे अर्धचन्द्र बाणोंके प्रहारसे उस बाणजालको छिन्न-भिन्न कर दिया और वे उस दैत्यपर बाणोंकी वृष्टि करने लगे; परन्तु दैत्यराज कुजम्भने अपने तीखे बाणोंसे उस बाणवृष्टिको काट दिया। उस बाणवृष्टिको विफल हुई देखकर धनेशने अपनी उस दुर्धर्ष शक्तिको हाथमें उठाया, जिसमें स्वर्णनिर्मित घंटियोंके शब्द हो रहे थे। उन्होंने अपने रत्ननिर्मित बाजूबंदके कान्तिसमूहसे सुशोभित हाथसे उस शक्तिको आजमाकर वेगपूर्वक कुजम्भके ऊपर छोड़ दिया। उस शक्तिने कुजम्भके दारुण हृदयको उसी प्रकार विदीर्ण कर दिया, जैसे निर्धन पुरुषकी अभिलषित धनाशा नष्ट हो जाती है। इस प्रकार वह शक्ति उसके हृदयको विदीर्ण करके भूतलपर जा गिरी, जिससे भयंकर आकृतिवाला वह दानव दो घड़ीतक मूर्च्छित पड़ा रहा। (मूर्च्छा भङ्ग होनेपर) उस दैत्यने एक लम्बे एवं तेज मुखवाले पट्टिशको हाथमें लिया। उसने उस पट्टिशसे कुबेरके स्तनोंके मध्यभागको इस प्रकार विदीर्ण कर दिया जैसे दुर्जन पुरुष अपने मर्मभेदी कठोर वाक्यसे सत्पुरुषके हृदयको विदीर्ण कर देता है। उस पट्टिशके आघातसे धनेश मूर्च्छित हो गये और रथके पिछले भागमें बूढ़े बैलकी तरह लुढ़क पड़े॥ ७६—८५॥ |
| तथागतं तु तं दृष्ट्वा धनेशं नरवाहनम्।<br>खड्गास्त्रो निर्ऋतिर्देवो निशाचरबलानुगः॥ ८६ | उन नरवाहन कुबेरको मूर्च्छित हुआ देखकर निर्ऋतिदेवने हाथमें तलवार लेकर निशाचरोंकी सेनाके साथ वेगपूर्वक भयंकर पराक्रमी कुजम्भपर आक्रमण |