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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 577 of 1098

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Page 577
  • अध्याय १५० * ५६७

| अभिदुद्राव वेगेन कुजम्भं भीमविक्रमम्।<br>अथ दृष्ट्वा तु दुर्धर्षं कुजम्भो राक्षसेश्वरम्॥ ८७<br><br>चोदयामास सैन्यानि राक्षसेन्द्रवधं प्रति।<br>स दृष्ट्वा चोदितां सेनां भल्लनानास्त्रभीषणाम्॥ ८८<br><br>रथादाप्लुत्य वेगेन भूषणद्युतिभास्वरः।<br>खड्गेन कमलानीव विकोशेनाम्बरत्विषा॥ ८९<br><br>चिच्छेद रिपुवक्त्राणि विचित्राणि समंततः।<br>तिर्यक्पृष्ठमधश्चोर्ध्वं दीर्घबाहुर्महासिना॥ ९०<br><br>संदष्टौष्ठपुटाटोपभ्रुकुटीविकटाननः।<br>प्रचण्डकोपरक्ताक्षो न्यकृन्तद् दानवान् रणे॥ ९१<br><br>ततो निःशेषितप्रायां विलोक्य स्वामनीकिनीम्।<br>मुक्त्वा कुजम्भो धनदं राक्षसेन्द्रमभिद्रवत्॥ ९२<br><br>लब्धसंज्ञोऽथ जम्भस्तु धनाध्यक्षपदानुगान्।<br>जीवग्राहान् स जग्राह बध्वा पाशैः सहस्रशः॥ ९३<br><br>मूर्तिमन्ति तु रत्नानि विविधानि च दानवाः।<br>वाहनानि च दिव्यानि विमानानि सहस्रशः॥ ९४<br><br>धनेशो लब्धसंज्ञोऽथ तामवस्थां विलोक्य तु।<br>निःश्वसन् दीर्घमुष्णं च रोषात् ताम्रविलोचनः॥ ९५<br><br>ध्यात्वास्त्रं गारुडं दिव्यं बाणं संधाय कार्मुके।<br>मुमोच दानवानीके तं बाणं शत्रुदारणम्॥ ९६<br><br>प्रथमं कार्मुकात् तस्य निश्चेरुर्धूमराजयः।<br>अनन्तरं स्फुलिङ्गानां कोटयो दीप्तवर्चसाम्॥ ९७<br><br>ततो ज्वालाकुलं व्योम चकारास्त्रं समन्ततः।<br>ततः क्रमेण दुर्वारं नानारूपं तदाभवत्॥ ९८<br><br>अमूर्तश्चाभवल्लोको ह्यन्धकारसमावृतः।<br>ततोऽन्तरिक्षे शंसन्ति तेजस्ते तु परिष्कृतम्॥ ९९ | किया। तब दुर्धर्ष राक्षसेश्वर निर्ऋतिको आक्रमण करते देख कुजम्भने उन राक्षसेन्द्रका वध करनेके लिये अपनी सेनाओंको ललकारा। भल्ल आदि नाना प्रकारके अस्त्रोंको धारण करनेसे भयंकर रूपवाली उस सेनाको आगे बढ़ते देखकर आभूषणोंकी कान्तिसे उद्भासित होते हुए निर्ऋतिदेव रथसे वेगपूर्वक कूद पड़े और नीली कान्तिवाले म्यानसे तलवार खींचकर उससे शत्रुओंके विचित्र आकारवाले मुखोंको कमल-पुष्पकी तरह काटने लगे। उस समय दाँतोंसे होंठको चबाने एवं भौंहें चढ़ी होनेके कारण उनका मुख भयंकर दीख रहा था और प्रचण्ड क्रोधके कारण उनके नेत्र लाल हो गये थे। इस प्रकार लम्बी भुजाओंवाले निर्ऋति रणभूमिमें आगे-पीछे, ऊपर-नीचे चारों ओर घूम-घूमकर उस विशाल तलवारसे दानवोंको टुकड़े-टुकड़े कर रहे थे। इस प्रकार अपनी सेनाको समाप्तप्राय देखकर कुजम्भने कुबेरको छोड़कर राक्षसेश्वर निर्ऋतिपर धावा बोल दिया॥ ८६-९२॥<br><br>इधर जब जम्भकी मूर्च्छा भंग हुई, तब उसने कुबेरके अनुचर हजारों यक्षोंको जीते-जी पकड़कर पाशोंसे बाँध लिया तथा दानवोंने उनके अनेकों प्रकारके मूर्तिमान् रत्नों, वाहनों और हजारों दिव्य विमानोंको अपने अधीन कर लिया। उधर जब कुबेरकी चेतना लौटी, तब उस दशाको देखकर क्रोधवश उनके नेत्र लाल हो गये और वे लम्बी एवं गरम साँस लेने लगे। तत्पश्चात् उन्होंने दिव्य गारुडास्त्रका ध्यान करके उस बाणका धनुषपर संधान किया और फिर उस शत्रुनाशक बाणको दानवोंकी सेनापर छोड़ दिया। पहले तो उनके धनुषसे धुएँकी पङ्क्तियाँ प्रकट हुईं। तदनन्तर उससे जलती हुई करोड़ों चिनगारियाँ निकलने लगीं। तत्पश्चात् उस अस्त्रने आकाशको चारों ओरसे लपटोंसे व्याप्त कर दिया। फिर वह नाना प्रकारके रूपोंमें फैलकर दुर्निवार हो गया। उस समय अन्धकारसे आच्छादित होनेके कारण सारा जगत् रूपरहित-सा दिखायी पड़ने लगा। तब आकाशमण्डलमें स्थित देवगण उस उत्कृष्ट तेजकी प्रशंसा करने लगे। यह |