Skip to content
SarvaKosh
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 575 of 1098

Read in context
Page 575
* अध्याय १५० *५६५
संस्कृतहिन्दी
पूरयामास वेगेन संछाद्य रविमण्डलम्।<br>जम्भोऽपि परमेकैकं शरैर्बहुभिराहवे॥ ६१<br><br>चिच्छेद लघुसंधानो धनेशस्यातिपौरुषात्।<br>ततो धनेशः संक्रुद्धो दानवेन्द्रस्य कर्मणा॥ ६२<br><br>व्यधमत् तस्य सैन्यानि नानासायकवृष्टिभिः।<br>तद् दृष्ट्वा दुष्कृतं कर्म धनाध्यक्षस्य दानवः॥ ६३<br><br>गृहीत्वा मुद्गरं भीममायसं हेमभूषितम्।<br>धनदानुचरान् यक्षान् निष्पिपेष सहस्रशः॥ ६४<br><br>ते वध्यमाना दैत्येन मुञ्चन्तो भैरवान् रवान्।<br>रथं धनपतेः सर्वे परिवार्य व्यवस्थिताः॥ ६५<br><br>दृष्ट्वा तानर्दितान् देवः शूलं जग्राह दारुणम्।<br>तेन दैत्यसहस्राणि सूदयामास सत्वरः॥ ६६<br><br>क्षीयमाणेषु दैत्येषु दानवः क्रोधमूर्च्छितः।<br>जग्राह परशुं दैत्यो मर्दनं दैत्यविद्विषाम्॥ ६७<br><br>स तेन शितधारेण धनभर्तुर्महारथम्।<br>चिच्छेद तिलशो दैत्यो ह्याखुः स्निग्धमिवाम्बरम्॥ ६८<br><br>पदातिरथ वित्तेशो गदामादाय भैरवीम्।<br>महाहवविमर्देषु दृप्तशत्रुविनाशिनीम्॥ ६९<br><br>अधृष्यां सर्वभूतानां बहुवर्षगणार्चिताम्।<br>नानाचन्दनदिग्धाङ्गीं दिव्यपुष्पविवासिताम्॥ ७०<br><br>निर्मलायोमयीं गुर्वीममोघां हेमभूषणाम्।<br>चिक्षेप मूर्ध्नि संक्रुद्धो जम्भस्य तु धनाधिपः॥ ७१<br><br>आयान्तीं तां समालोक्य तडित्संघातमण्डिताम्।<br>दैत्यो गदाभिघातार्थं शस्त्रवृष्टिं मुमोच ह॥ ७२<br><br>चक्राणि कुणपान् प्रासान् भुशुण्डीः पट्टिशानपि।<br>हेमकेयूरनद्धाभ्यां बाहुभ्यां चण्डविक्रमः॥ ७३असुरकी सेनाओंको ढक दिया। यहाँतक कि उस बाणवर्षासे सूर्यमण्डल भी आच्छादित हो गया॥ ५०—६० १/२॥<br><br>तब शीघ्रतापूर्वक बाण संधान करनेवाले जम्भने भी युद्धस्थलमें परम पुरुषार्थ प्रकट करके कुबेरके एक-एक बाणको बहुसंख्यक बाणोंसे काट गिराया। दानवेन्द्रके उस कर्मको देखकर धनेश अत्यन्त कुपित हो उठे, तब वे नाना प्रकारके बाणोंकी वृष्टि करके उसकी सेनाका विध्वंस करने लगे। कुबेरके दुष्कर कर्मको देखकर दानवराज जम्भने लौहनिर्मित एवं स्वर्णजटित भयंकर मुद्गरको लेकर कुबेरके अनुचर हजारों यक्षोंको चकनाचूर कर दिया। दैत्यद्वारा मारे जाते हुए वे सभी यक्ष भयंकर चीत्कार करते हुए कुबेरके रथको घेरकर खड़े हो गये। उन यक्षोंको दुःखी देखकर कुबेरने अपना भीषण त्रिशूल हाथमें लिया और उससे शीघ्र ही हजारों दैत्योंको मौतके हवाले कर दिया। इस प्रकार दैत्योंका विनाश होते देखकर दानवराज जम्भ क्रोधसे भर गया और उसने देवताओंका मर्दन करनेवाले तेज धारसे युक्त फरसेसे कुबेरके महान् रथको उसी प्रकार तिल-तिल करके काट डाला, जैसे चूहा रेशमी वस्त्रको कुतर डालता है। इससे कुबेर परम क्रुद्ध हो उठे, तब उन्होंने पैदल ही अपनी उस भयंकर गदाको, जो बड़े-बड़े युद्धोंमें गर्वीले शत्रुओंका विनाश करनेवाली, सभी प्राणियोंके लिये अधृष्य, बहुत वर्षोंसे पूजित, नाना प्रकारके चन्दनोंके अनुलेपसे युक्त, दिव्य पुष्पोंसे सुवासित, निर्मल लौहकी बनी हुई, वजनदार, अमोघ और स्वर्णभूषित थी, हाथमें लेकर जम्भके मस्तकको लक्ष्य बनाकर छोड़ दिया॥ ६१—७१॥<br><br>विद्युत्समूहसे विभूषित-जैसी उस गदाको अपनी ओर आती देखकर दैत्यराज जम्भ उसको नष्ट करनेके लिये बाणोंकी वृष्टि करने लगा। यद्यपि प्रचण्ड पराक्रमी जम्भ स्वर्णनिर्मित बाजूबन्दोंद्वारा विभूषित भुजाओंसे चक्रों, कुणपों, भालों, भुशुण्डियों और पट्टिशोंका प्रहार