मत्स्य महापुराण

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१०८० * मत्स्यपुराण *
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
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| कल्पानां कीर्तनं वक्ष्ये महापातकनाशनम्।<br>यस्यानुकीर्तनादेव वेदपुण्येन युज्यते॥ २<br>प्रथमः श्वेतकल्पस्तु द्वितीयो नीललोहितः।<br>वामदेवस्तृतीयस्तु ततो राथन्तरोऽपरः॥ ३<br>रौरवः पञ्चमः प्रोक्तः षष्ठो देव इति स्मृतः।<br>सप्तमोऽथ बृहत्कल्पः कन्दर्पोऽष्टम उच्यते॥ ४<br>सद्योऽथ नवमः प्रोक्त ईशानो दशमः स्मृतः।<br>तम एकादशः प्रोक्तस्तथा सारस्वतः परः॥ ५<br>त्रयोदश उदानस्तु गारुडोऽथ चतुर्दशः।<br>कौर्मः पञ्चदशः प्रोक्तः पौर्णमास्यामजायत॥ ६<br>षोडशो नारसिंहस्तु समानस्तु ततोऽपरः।<br>आग्नेयोऽष्टादशः प्रोक्तः सोमकल्पस्तथा परः॥ ७<br>मानवो विंशतिः प्रोक्तस्तत्पुमानिति चापरः।<br>वैकुण्ठश्चापरस्तद्वल्लक्ष्मीकल्पस्तथा परः॥ ८<br>चतुर्विंशतिमः प्रोक्तः सावित्रीकल्पसंज्ञकः।<br>पञ्चविंशस्ततो घोरो वाराहस्तु ततोऽपरः॥ ९<br>सप्तविंशोऽथ वैराजो गौरीकल्पस्तथापरः।<br>माहेश्वरस्तु स प्रोक्तस्त्रिपुरं यत्र घातितम्॥ १०<br>पितृकल्पस्तथान्ते तु या कुहूर्ब्रह्मणः पुरा।<br>इत्येवं ब्रह्मणो मासः सर्वपातकनाशनः॥ ११ | अब मैं कल्पोंका वर्णन कर रहा हूँ, जो महान् पातकोंको नष्ट करनेवाला है और जिसका अनुकीर्तन करनेसे वेदाध्ययनका पुण्य प्राप्त होता है। उनमें प्रथम श्वेतकल्प, दूसरा नीललोहित, तीसरा वामदेव, चौथा रथन्तरकल्प, पाँचवाँ रौरवकल्प, छठा देवकल्प, सातवाँ बृहत्कल्प, आठवाँ कंदर्पकल्प, नवाँ सद्यःकल्प, दसवाँ ईशानकल्प, ग्यारहवाँ तमःकल्प, बारहवाँ सारस्वतकल्प, तेरहवाँ उदानकल्प, चौदहवाँ गारुडकल्प तथा पंद्रहवाँ कौर्मकल्प कहा गया है। इस दिन ब्रह्माजीकी पूर्णिमातिथि थी। सोलहवाँ नारसिंहकल्प, सत्रहवाँ समानकल्प, अठारहवाँ आग्नेयकल्प, उन्नीसवाँ सोमकल्प, बीसवाँ मानवकल्प, इक्कीसवाँ तत्पुमान्कल्प, बाईसवाँ वैकुण्ठकल्प, तेईसवाँ लक्ष्मीकल्प, चौबीसवाँ सावित्रीकल्प, पचीसवाँ घोरकल्प, छब्बीसवाँ वाराहकल्प, सत्ताईसवाँ वैराजकल्प, अट्ठाईसवाँ गौरीकल्प, उन्तीसवाँ माहेश्वरकल्प कहा गया है, जिसमें त्रिपुरका विनाश हुआ था। तीसवाँ पितृकल्प है, जो प्राचीन कालमें ब्रह्माकी अमावस्या थी। इस प्रकार ये सभी तीसों कल्प ब्रह्माके एक मास हैं, जो सभी पातकोंका नाश करनेवाले हैं॥ २—११॥ |
| आदावेव हि माहात्म्यं यस्मिन् यस्य विधीयते।<br>तस्य कल्पस्य तन्नाम विहितं ब्रह्मणा पुरा॥ १२<br>संकीर्णास्तामसाश्चैव राजसाः सात्त्विकास्तथा।<br>रजस्तमोमयास्तद्वदेते त्रिंशदुदाहृताः॥ १३<br>संकीर्णेषु सरस्वत्याः पितॄणां व्युष्टिरुच्यते।<br>अग्नेः शिवस्य माहात्म्यं तामसेषु दिवाकरे।<br>राजसेषु च माहात्म्यमधिकं ब्रह्मणः स्मृतम्॥ १४<br>यस्मिन् कल्पे तु यत्प्रोक्तं पुराणं ब्रह्मणा पुरा।<br>तस्य तस्य तु माहात्म्यं तत्स्वरूपेण वर्ण्यते॥ १५<br>सात्त्विकेष्वधिकं तद्वद् विष्णोर्माहात्म्यमुत्तमम्।<br>तथैव योगसंसिद्धा गमिष्यन्ति परां गतिम्॥ १६ | प्रारम्भमें ही जिस कल्पमें जिसका माहात्म्य वर्णन किया गया है, उसी आधारपर ब्रह्माने उस कल्पका वह नाम रखा है। ये तीसों कल्प संकीर्ण, तामस, राजस, सात्त्विक तथा रजस्तमोमय—इन भेदोंसे युक्त कहे गये हैं। संकीर्ण कल्पोंमें सरस्वती तथा पितरोंका, तामसमें अग्नि, सूर्य तथा शिवका और राजसमें ब्रह्माका अधिक माहात्म्य कहा गया है। प्राचीन कालमें ब्रह्माने जिस कल्पमें जिस पुराणको कहा है, उसी कल्पका माहात्म्य उस पुराणमें वर्णन किया गया है। सात्त्विक कल्पोंमें उत्तम रूपसे विष्णु भगवान्का माहात्म्य वर्णित है। योगसे सिद्धि प्राप्त करनेवाले लोग उनके पाठसे |