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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1091 of 1098

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Page 1091
  • अध्याय २९० *
    १०८१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्राह्मं पाद्ममिमं यस्तु पठेत् पर्वणि पर्वणि।<br>तस्य धर्मे मतिर्ब्रह्मा करोति विपुलां श्रियम्॥ १७<br><br>यस्तु दद्यादिमान् कृत्वा हैमान् पर्वणि पर्वणि।<br>ब्रह्मविष्णुपुरे वासं मुनिभिः पूज्यते दिवि॥ १८<br><br>सर्वपापक्षयकरं कल्पदानं यतो भवेत्।<br>मुनिरूपांस्ततः कृत्वा दद्यात् कल्पान् विचक्षणः॥ १९<br><br>पुराणसंहिता चेयं तव भूप मयोदिता।<br>सर्वपापहरा नित्यमारोग्यश्रीफलप्रदा॥ २०<br><br>ब्रह्मसंवत्सरशतादेकाहं शैवमुच्यते।<br>शिववर्षशतादेकं निमेषं वैष्णवं विदुः॥ २१<br><br>यदा स विष्णुर्जागर्ति तदेदं चेष्टते जगत्।<br>यदा स्वपिति शान्तात्मा तदा सर्वं निमीलति॥ २२परमगतिको प्राप्त होते हैं। जो व्यक्ति प्रत्येक पर्वमें इन ब्रह्म तथा पद्म नामक पुराणोंका पाठ करता है, उसकी बुद्धिको ब्रह्मा धर्ममें लगाते हैं तथा उसे प्रचुर सम्पत्ति प्रदान करते हैं। जो व्यक्ति पर्व आनेपर इन्हें सोनेका बनवाकर दान करता है, वह ब्रह्मा तथा विष्णुके पुरमें निवास करते हुए स्वर्गमें मुनियोंद्वारा पूजित होता है; क्योंकि कल्पदान सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला होता है। विचक्षण पुरुषको इन कल्पोंको मुनिके समान स्वरूपवाला बनाकर दान करना चाहिये। राजन्! यह पुराण-संहिता, जो मैंने तुम्हें बताया है, सभी पापोंको नष्ट करनेवाली तथा नित्य आरोग्य एवं श्रीरूप फल प्रदान करनेवाली है। ब्रह्माका सौ वर्ष शिवका एक दिन तथा शिवका सौ वर्ष विष्णुका एक निमेष कहा जाता है। जब वे विष्णु जागते रहते हैं, तब यह जगत् भी चेष्टावान् रहता है और जब वे शान्त होकर शयन करते हैं, तब सारा जगत् शान्त हो जाता है॥ १२—२२॥
सूत उवाच<br>इत्युक्त्वा देवदेवेशो मत्स्यरूपी जनार्दनः।<br>पश्यतां सर्वभूतानां तत्रैवान्तरधीयत॥ २३<br><br>वैवस्वतो हि भगवान् विसृज्य विविधाः प्रजाः।<br>स्वान्तरं पालयामास मार्तण्डकुलवर्धनः॥ २४<br><br>यस्य मन्वन्तरं चैतदधुना चानुवर्तते।<br>पुण्यं पवित्रमेतद् वः कथितं मत्स्यभाषितम्।<br>पुराणं सर्वशास्त्राणां यदेतन्मूर्ध्नि संस्थितम्॥ २५**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! ऐसा कहकर मत्स्यरूपी देवदेवेश्वर जनार्दन सभी प्राणियोंके सामने वहीं अन्तर्हित हो गये। विवस्वान्‌के पुत्र मार्तण्ड-कुलवर्धन भगवान् मनु विविध प्रजाओंकी सृष्टि कर अपनी अवधितक उनका पालन करते रहे। उन्हींका यह मन्वन्तर अभीतक चला आ रहा है। इस प्रकार मैंने आपलोगोंसे मत्स्यभगवान्‌द्वारा कहे गये पुण्यप्रद पवित्र पुराणका वर्णन कर दिया। यह मत्स्यपुराण सभी शास्त्रोंमें शिरोभूषण-रूपसे अवस्थित है॥ २३—२५॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे कल्पानुकीर्त्तनं नाम नवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २९०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें कल्पानुकीर्तन नामक दो सौ नब्बेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २९०॥