मत्स्य महापुराण

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| * अध्याय २९० * | १०७९ |
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| अथर्ववेदस्य पुनः स्रुक्स्रुवौ कमलं करे।<br>पुराणवेदो वरदः साक्षसूत्रकमण्डलुः॥ ९<br>परितः सर्वधान्यानि चामरासनदर्पणम्।<br>पादुकोपानहच्छत्रं दीपिकाभूषणानि च॥ १०<br>शय्यां च जलकुम्भांश्च पञ्चवर्णं वितानकम्।<br>स्नात्वाधिवासनान्ते तु मन्त्रमेतमुदीरयेत्॥ ११<br>नमो वः सर्वदेवानामाधारेभ्यश्चराचरे।<br>महाभूताधिदेवेभ्यः शान्तिरस्तु शिवं मम॥ १२<br>यस्मान्न किंचिदप्यस्ति महाभूतैर्विना कृतम्।<br>ब्रह्माण्डे सर्वभूतेषु तस्माच्छ्रीरक्षयास्तु मे॥ १३<br>इत्युच्चार्य महाभूतघटं यो विनिवेदयेत्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः स याति परमां गतिम्॥ १४<br>विमानेनार्कवर्णेन पितृबन्धुसमन्वितः।<br>स्तूयमानो वरस्त्रीभिः पदमभ्येति वैष्णवम्॥ १५<br>षोडशैतानि यः कुर्यान्महादानानि मानवः।<br>न तस्य पुनरावृत्तिरिह लोकेऽभिजायते॥ १६<br>इह पठति य इत्थं वासुदेवस्य पार्श्वे<br>ससुतपितृकलत्रः संशृणोतीह सम्यक्।<br>मुररिपुभवने वै मन्दिरे वार्कलक्ष्म्या<br>त्वमरपुरवधूभिर्मोदते सोऽपि कल्पम्॥ १७ | तथा अथर्ववेदको हाथोंमें स्रुक्, स्रुवा और कमल लिये हुए बनाना चाहिये। पञ्चमवेद पुराणके आयुध अक्षसूत्र, कमण्डलु और अभय तथा वरद मुद्राएँ हैं॥ १–९॥<br>उस कलशके चारों ओर सभी (अठारह) प्रकारके अन्न, चामर, आसन, दर्पण, पादुका, जूता, छत्र, दीपक, आभूषण, शय्या, जलपूर्ण कलश और पँचरंगा वितान रखना चाहिये। फिर यजमान अधिवासनके अन्तमें स्नान करके इस मन्त्रका उच्चारण करे—'इस चराचर जगत्में आपलोग सम्पूर्ण देवताओंके आधार तथा पञ्चमहाभूतोंके अधिदेवता हैं, आपलोगोंको प्रणाम है। आप मुझे शान्ति एवं कल्याण प्रदान कीजिये। चूँकि इस ब्रह्माण्डके सभी जीवोंमें इन पञ्च महाभूतोंके अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है, अतः इनकी कृपासे मुझे अक्षय लक्ष्मी प्राप्त हो।' इस प्रकार उच्चारण करनेके बाद जो व्यक्ति महाभूतघटका दान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर परम गतिको प्राप्त होता है तथा पितरों एवं बन्धुगणोंके साथ सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर आरूढ़ हो अप्सराओंद्वारा प्रशंसित होता हुआ विष्णुके लोकको जाता है। जो मानव इन उपर्युक्त सोलहों महादानोंका अनुष्ठान करता है, उसे इस लोकमें पुनः नहीं आना पड़ता। इस पृथ्वीपर जो मनुष्य वासुदेवके समीप इसे इस विधिसे पढ़ता है तथा पुत्र, पिता एवं स्त्रीके साथ भलीभाँति श्रवण करता है, वह सूर्यके समान तेजस्वी होकर देवाङ्गनाओंके साथ विष्णुलोकमें कल्पपर्यन्त आनन्दका अनुभव करता है॥ १०–१७॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तनं नामैकोननवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णन नामक दो सौ नवासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८९॥
दो सौ नब्बेवाँ अध्याय
कल्पनुकीर्तन
| मनुरुवाच<br><br>कल्पमानं त्वया प्रोक्तं मन्वन्तरयुगेषु च।<br>इदानीं कल्पनामानि समासात् कथयाच्युत॥ १ | मनुने पूछा—अच्युत! मन्वन्तर एवं युगोंका वर्णन करते समय आपने कल्पका प्रमाण तो बता दिया है, अब मुझे (सभी तीस) कल्पोंके नाम संक्षेपसे बतलाइये॥ १॥ |