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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1077 of 1098

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Page 1077
* अध्याय २८२ *१०६७
संस्कृतहिन्दी अनुवाद
अत्राप्युपोषितस्तद्वद् ब्राह्मणैः सह भोजनम्।<br>कुर्यात् पुष्परथाकारं काञ्चनं मणिमण्डितम्॥ ३<br>वलभीभिर्विचित्राभिश्चतुश्चक्रसमन्वितम् ।<br>कृष्णाजिने तिलद्रोणं कृत्वा संस्थापयेद् रथम्॥ ४<br>लोकपालाष्टकोपेतं ब्रह्मार्कशिवसंयुतम्।<br>मध्ये नारायणोपेतं लक्ष्मीपुष्टिसमन्वितम्॥ ५<br>तथाष्टादश धान्यानि भाजनासनचन्दनैः।<br>दीपिकोपानहच्छत्रदर्पणं पादुकान्वितम्॥ ६<br>ध्वजे तु गरुडं कुर्यात् कूबराग्रे विनायकम्।<br>नानाफलसमायुक्तमुपरिष्टाद् वितानकम्॥ ७<br>कौशेयं पञ्चवर्णं तु अम्लानकुसुमान्वितम्।<br>चतुर्भिः कलशैः सार्धं गोभिरष्टाभिरन्वितम्॥ ८<br>चतुर्भिर्हेममातङ्गैर्मुक्तादामविभूषितैः ।<br>स्वरूपतः गजाभ्यां च युक्तं कृत्वा निवेदयेत्॥ ९करे। इस महादानमें भी यजमानको उपवास रखकर ब्राह्मणोंके साथ भोजन करनेका विधान है। उसे मणियोंसे सुशोभित पुष्परथके आकारका सुवर्णमय रथ, जो विचित्र तोरणों और चार पहियोंसे युक्त हो, बनवाना चाहिये। उस रथको कृष्णमृगचर्मके ऊपर रखे गये एक द्रोण तिलपर स्थापित करना चाहिये। वह रथ आठों लोकपाल, ब्रह्मा, सूर्य और शिवकी प्रतिमाओंसे युक्त हो। उसके मध्य-भागमें लक्ष्मीसहित विष्णुभगवान्‌की भी मूर्ति होनी चाहिये। उसे अठारह प्रकारके अन्न, पात्र, आसन, चन्दन, दीपक, जूता, छत्र, दर्पण और पादुकासे भी युक्त होना चाहिये। उसके ध्वजपर गरुड तथा जुआके अग्रभागपर विनायकको स्थापित करना चाहिये। वह नाना प्रकारके फलोंसे युक्त हो और उसके ऊपर चंदोवा तना हो। वह पँचरंगे रेशमी वस्त्र, विकसित पुष्पों, चार माङ्गलिक कलशोंके साथ आठ गौओं तथा मोतियोंकी मालाओंसे विभूषित चार सुवर्णके हाथियोंसे सम्पन्न हो। पुनः दो जीवित हाथियोंको रथमें जोतकर दान करना चाहिये॥ १–९॥
कुर्यात् पञ्चपलादूर्ध्वमा भारादपि शक्तितः।<br>तथा मङ्गलशब्देन स्नापितो वेदपुङ्गवैः॥ १०<br>त्रिः प्रदक्षिणामावृत्य गृहीतकुसुमाञ्जलिः।<br>इममुच्चारयेन्मन्त्रं ब्राह्मणेभ्यो निवेदयेत्॥ ११अपनी शक्तिके अनुसार उस रथको पाँच पलसे ऊपर एक भार सोनेतकका बनवाना चाहिये। इस प्रकार वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा माङ्गलिक शब्दोंके उच्चारणके साथ स्नान कराया गया यजमान अञ्जलिमें फूल लेकर तीन बार प्रदक्षिणा करे तथा निम्नलिखित मन्त्रका उच्चारण कर ब्राह्मणोंको दान दे—
नमो नमः शङ्करपद्मजार्क-<br>लोकेशविद्याधरवासुदेवैः ।<br>त्वं सेव्यसे वेदपुराणयज्ञै-<br>स्तेजोमयस्यन्दन पाहि तस्मात्॥ १२'तेजोमय स्यन्दन! शङ्कर, ब्रह्मा, सूर्य, लोकपाल, विद्याधर, वासुदेव, वेद, पुराण और यज्ञ तुम्हारी सेवा करते हैं, अतः तुम मेरी रक्षा करो। तुम्हें बारम्बार नमस्कार है।
यत्तत्पदं परमगुह्यतमं मुरारे-<br>रानन्दहेतुगुणरूपविमुक्तमन्तः ।<br>योगैकमानसद्दशो मुनयः समाधौ<br>पश्यन्ति तत्त्वमसि नाथ रथाधिरूढ ॥ १३रथाधिरूढ स्वामिन्! विष्णुभगवान्‌का जो पद परमगुह्यतम, आनन्दका हेतु और गुण एवं रूपसे परे है तथा एकमात्र योगरूप मानसिक दृष्टिवाले मुनिगण जिसका समाधिकालमें दर्शन करते हैं वह आप ही हैं।
यस्मात् त्वमेव भवसागरसम्प्लुताण्ड-<br>मानन्दभारमृतमध्वरपानपात्रम् ।<br>तस्मादघौघशमनेन कुरु प्रसादं<br>चामीकरेभरथ माधव सम्प्रदानात्॥ १४माधव! चूँकि आप ही भवसागरमें डूबनेवालोंके लिये आनन्दके पात्र, सत्यस्वरूप तथा यज्ञोंमें पानपात्र हैं, इसलिये आप इस सुवर्णमय हस्तिरथके दानसे मेरे पापपुञ्जोंको नष्टकर मुझपर कृपा कीजिये।'
इत्थं प्रणम्य कनकेभरथप्रदानं<br>यः कारयेत् सकलपापविमुक्तदेहः।<br>विद्याधरामरमुनीन्द्रगणाभिजुष्टं<br>प्राप्नोत्यसौ पदमतीन्द्रियमिन्दुमौलेः॥ १५जो मनुष्य इस प्रकार प्रणाम करके स्वर्णमय हस्तिरथका दान करता है उसका शरीर समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और वह शङ्करजीके विद्याधर, देवगण एवं मुनीन्द्रगणोंद्वारा सेवित इन्द्रियातीत लोकको प्राप्त करता है। वह पूर्व