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Read in context१०६६ * मत्स्यपुराण *
| नमो नमः पापविनाशनाय<br>विश्वात्मने वेदतुरङ्गमाय।<br>धाम्नामधीशाय दिवाकराय<br>पापौघदावानल देहि शान्तिम्॥ १२<br>वस्वष्टकादित्यमरुद्गणानां<br>त्वमेव धाता परमं निधानम्।<br>यतस्ततो मे हृदयं प्रयातु<br>धर्मैकतानत्वमघौघनाशात् ॥ १३<br>इति तुरगरथप्रदानमेतद्<br>भवभयसूदनमत्र यः करोति।<br>स कलुषपटलैर्विमुक्तदेहः<br>परममुपैति पदं पिनाकपाणेः॥ १४<br>देदीप्यमानवपुषा विजितप्रभाव-<br>माक्रम्य मण्डलमखण्डितचण्डभानोः।<br>सिद्धाङ्गनानयनषट्पदपीयमान-<br>वक्त्राम्बुजोऽम्बुजभवेन चिरं सहास्ते॥ १५<br>इति पठति शृणोति वा य इत्थं<br>कनकपुरगरथप्रदानमस्मिन् ।<br>न स नरकपुरं व्रजेत् कदाचि-<br>न्नरकरिपोर्भवनं प्रयाति भूयः॥ १६ | 'पापसमूहके लिये दावाग्निस্বরূপ देव! आप पापोंके विनाशक, विश्वात्मा, वेदरूपी घोड़ोंसे युक्त, तेजोंके अधीश्वर और सूर्यरूप हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है। आप मुझे शान्ति प्रदान कीजिये। चूँकि आप ही आठों वसुओं, आदित्यगण और मरुद्गणोंके भरण-पोषण करनेवाले और परम निधान हैं, अतः आपकी कृपासे पापसमूहके नष्ट हो जानेसे मेरा हृदय धर्मकी एकतान्ताको प्राप्त हो। इस प्रकार जो मनुष्य इस लोकमें भव-भय-नाशक इस तुरगरथ-प्रदान नामक महादानको करता है उसका शरीर पापसमूहसे मुक्त हो जाता है और वह पिनाकपाणिके परम पदको प्राप्त करता है तथा सिद्धाङ्गनाओंके नेत्ररूपी भ्रमरोंद्वारा पान किये जाते हुए मुखकमलवाला वह अपने देदीप्यमान शरीरद्वारा पूर्णरूपसे तपनेवाले सूर्यके विजितप्रभाववाले मण्डलको पारकर ब्रह्माके साथ चिरकालतक निवास करता है। जो प्राणी इस लोकमें सुवर्णतुरगरथ नामक महादानकी विधिको पढ़ता अथवा सुनता है, वह कभी भी नरक-लोकमें नहीं जाता, अपितु नरकासुरके शत्रु भगवान् विष्णुके लोकको जाता है'॥ ९—१६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हिरण्याश्वरथप्रदानविधिर्नामैकाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८१॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णनप्रसङ्गमें हिरण्याश्वरथ-प्रदान-विधि नामक दो सौ इक्यासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८१॥
दो सौ बयासीवाँ अध्याय
हेमहस्तिरथ-दानकी विधि
| मत्स्य उवाच | **मत्स्यभगवान्ने कहा—**अब इसके बाद मैं मङ्गलमय सुवर्णनिर्मित हस्तिरथ नामक महादानका वर्णन कर रहा हूँ, जिसे प्रदान करनेसे मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है। पूर्वकथित तुलापुरुष-दानकी तरह किसी पुण्य तिथिके आनेपर बुद्धिमान् यजमानको ब्राह्मणोंद्वारा पुण्याहवाचन कराकर लोकपालोंका आवाहन करना चाहिये; फिर उसी प्रकार ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, आभूषण और आच्छादन आदिको इकट्ठा |
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| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि हेमहस्तिरथं शुभम्।<br>यस्य प्रदानाद् भुवनं वैष्णवं याति मानवः॥ १<br><br>पुण्यां तिथिंमथासाद्य तुलापुरुषदानवत्।<br>विप्रावाचनकं कुर्याल्लोकेशावाहनं बुधः।<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ॥ २ |