मत्स्य महापुराण

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१०६८ * मत्स्यपुराण *
| कृतदुरितवितानप्रज्वलद्वह्निजाल-<br> व्यतिकरकृतदाहोद्वेगभाजोऽपि बन्धून्।<br>नयति स पितृपुत्रान् बान्धवानप्यशेषान्<br> कृतगजरथदानाच्छाश्वतं सद्म विष्णोः॥ १६॥ | जन्मके किये गये दुष्कर्म-रूप वितानसे आच्छादित प्रज्वलित अग्निकी ज्वालाओंके संयोगसे उत्पन्न हुए दाहके उद्वेगसे युक्त बन्धुओं, पितरों, पुत्रों तथा सम्पूर्ण बान्धवोंको इस हस्तिरथके दानसे विष्णुभगवान्के शाश्वत लोकमें ले जाता है॥ १०—१६॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हेमहस्तिरथप्रदानविधिर्नाम द्व्यशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २८२॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादान-वर्णन-प्रसङ्गमें हेमहस्तिरथ-प्रदान-विधि नामक दो सौ बयासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २८२॥
दो सौ तिरासीवाँ अध्याय
पञ्चलाङ्गल (हल) प्रदानकी विधि
| मत्स्य उवाच | मत्स्यभगवान्ने कहा— |
|---|---|
| अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>पञ्चलाङ्गलकं नाम महापातकनाशनम्॥ १<br>पुण्यां तिथिंमथासाद्य युगादिग्रहणादिकाम्।<br>भूमिदानं नरो दद्यात् पञ्चलाङ्गलकान्वितम्॥ २<br>खर्वटं खेटकं वापि ग्रामं वा सस्यशालिनम्।<br>निवर्त्तनशतं वापि तदर्धं वापि शक्तितः॥ ३<br>सारदारुमयान् कृत्वा हलान् पञ्च विचक्षणः।<br>सर्वोपकरणैर्युक्तानन्यान् पञ्च च काञ्चनान्।<br>कुर्यात् पञ्चपलादूर्ध्वमासहस्रपलावधि॥ ४<br>वृषाँल्लक्षणसंयुक्तान् दश चैव धुरन्धरान्।<br>सुवर्णशृङ्गाभरणान् मुक्तालाङ्गलभूषणान्॥ ५<br>रूप्यपादाग्रतिलकान् रक्तकौशेयभूषणान्।<br>स्रग्दामचन्दनयुताञ्शालायामधिवासयेत्॥ ६<br>पर्जन्यादित्यरुद्रेभ्यः पायसं निर्वपेच्चरुम्।<br>एकस्मिन्नेव कुण्डे तु गुरुस्तेभ्यो निवेदयेत्॥ ७<br>पलाशसमिधस्तद्वदाज्यं कृष्णतिलास्तथा।<br>तुलापुरुषवत् कुर्याल्लोकेशावाहनं बुधः॥ ८<br>ततो मङ्गलशब्देन शुक्लमाल्याम्बरो बुधः।<br>आहूय द्विजदाम्पत्यं हेमसूत्राङ्गुलीयकैः॥ ९ | अब इसके बाद मैं महापातकनाशी अतिश्रेष्ठ पञ्चलाङ्गल नामक महादानका वर्णन कर रहा हूँ। युगादि तिथियों तथा सूर्यग्रहण आदिके अवसरपर मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार पाँच हलोंसे युक्त, फसलसे सुशोभित ग्राम, खेट, खर्वट, एक सौ निवर्तन या उससे आधा पचास निवर्तन भूमिको दान करना चाहिये। विचक्षण पुरुष साखूकी लकड़ीके पाँच तथा सुवर्णके बने हुए अन्य पाँच हलोंको सभी सामग्रियोंसे युक्त करे। वे हल पाँच पल सोनेसे ऊपर एक हजार पलतकके बनवाने चाहिये। साथ ही दस वृषभोंको, जो उत्तम लक्षणोंसे युक्त तथा भार ढोनेमें समर्थ हों, जिनकी सींगें सुवर्णसे, पूँछ मोतीसे और खुर चाँदीसे विभूषित हों, जिनके सिरपर तिलक लगा हो, जो लाल रेशमी वस्त्रसे सुशोभित तथा पुष्पमाला और चन्दनसे युक्त हों, शालामें अधिवासित कराये। फिर पर्जन्य, आदित्य और रुद्रके लिये खीरकी चरु तैयार करे और गुरु उसे एक ही कुण्डमें उनके लिये निवेदित करे। उसी प्रकार पलाशकी समिधा, घृत तथा काले तिलका हवन करे। बुद्धिमान् यजमान तुलापुरुष-दानकी भाँति लोकपालोंका आवाहन करे। तदनन्तर शुक्ल वस्त्र एवं पुष्पमाला धारण कर बुद्धिमान् पुरुष माङ्गलिक शब्दोंके साथ द्विजदम्पतिको बुलाकर सोनेकी |