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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1075 of 1098

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Page 1075
* अध्याय २८१ *१०६५

दो सौ इक्यासीवाँ अध्याय

हिरण्याश्वरथ-दानकी विधि

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मत्स्य उवाच<br><br>अथातः सम्प्रवक्ष्यामि महादानमनुत्तमम्।<br>पुण्यमश्वरथं नाम महापातकनाशनम्॥ १<br><br>पुण्यं दिनमथासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>लोकेशावाहनं कुर्यात् तुलापुरुषदानवत्॥ २<br><br>ऋत्विङ् मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम्।<br>कृष्णाजिने तिलान् कृत्वा काञ्चनं स्थापयेद् रथम्॥ ३<br><br>सप्ताश्वं चतुरश्वं वा चतुश्चक्रं सकूबरम्।<br>ऐन्द्रनीलेन कुम्भेन ध्वजरूपेण संयुतम्॥ ४<br><br>लोकपालाष्टकोपेतं पद्मरागदलान्वितम्।<br>चतुरः पूर्णकलशान् धान्यान्यष्टादशैव तु॥ ५<br><br>कौशेयवस्त्रसंयुक्तमुपरिष्टाद् वितानकम्।<br>काल्येक्षुफलसंयुक्तं पुरुषेण समन्वितम्॥ ६<br><br>यो यद्भक्तः पुमान् कुर्यात् स तन्नाम्नाधिवासनम्।<br>छत्रचामरकौशेयवस्त्रोपानहपादुकम् ॥ ७<br><br>गोभिर्विभवतः सार्धं दद्याच्च शयनादिकम्।<br>अभावात् त्रिपलादूर्ध्वं शक्तितः कारयेद् बुधः॥ ८**मत्स्यभगवान्ने कहा—**अब इसके बाद मैं सर्वश्रेष्ठ पुण्यप्रद एवं महापातकोंके विनाशक अश्वरथ नामक महादानका वर्णन कर रहा हूँ। इस दानमें भी पुण्य पर्वदिन आनेपर तुलापुरुष-दानकी तरह यजमान पुण्याहवाचन कर लोकपालोंका आवाहन करे तथा ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, आभूषण और आच्छादन आदिको इकट्ठा करे। फिर (कम धन हो तो एककुण्डी होम आदिका विधान कर) वेदीपर कृष्णमृग-चर्मको फैलाकर उसके ऊपर रखी हुई तिलोंकी राशिपर स्वर्णमय रथकी स्थापना करे। वह रथ सात या चार घोड़ोंसे युक्त हो। उसमें चार चक्के होने चाहिये और उसे जुआसे सम्पन्न तथा इन्द्रनील मणिके कलश और ध्वजासे सुशोभित करना चाहिये। उसपर पद्मरागमणिके दलसे युक्त आठों लोकपालोंकी मूर्ति रेशमी वस्त्रसे सुशोभित, जलसे भरे हुए चार कलश तथा अठारह धान्य हों और उसके ऊपर चाँदौवा तना हो। उसे पुष्प-माला, ईख और फलसे संयुक्त तथा पुरुषसे समन्वित होना चाहिये। जो पुरुष जिस देवताका भक्त हो, वह उसीके नामका उच्चारण कर अधिवासन करे। छत्र, चमर, रेशमी वस्त्र, जूते, पादुका तथा अपनी आर्थिक शक्तिके अनुसार गौओंके साथ शय्या आदिका दान करना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुषको अर्थाभावमें तीन पल सोनेसे अधिक तौलका रथ बनवाना चाहिये॥ १–८॥
अश्वाष्टकेन संयुक्तं चतुर्भिरथ वाजिभिः।<br>द्वाभ्यामपि युतं दद्याद्धेमसिंहध्वजान्वितम्॥ ९<br><br>चक्ररक्षावुभौ तस्य तुरगस्थावथाश्विनौ।<br>पुण्यकालमथावाप्य पूर्ववत् स्नापितो द्विजैः॥ १०<br><br>त्रिः प्रदक्षिणमावृत्य गृहीतकुसुमाञ्जलिः।<br>शुक्लमाल्याम्बरो दद्यादिमं मन्त्रमुदीरयेत्॥ ११उसी प्रकार आठ, चार अथवा दो अश्वोंसे युक्त तथा स्वर्णमय सिंहध्वजसे समन्वित रथका दान करना चाहिये। घोड़ेपर सवार दोनों अश्विनीकुमारोंको उसके चक्ररक्षकके रूपमें स्थापित करना चाहिये। इस प्रकार पुण्यकाल आनेपर ब्राह्मणोंद्वारा पूर्ववत् स्नान कराया हुआ यजमान श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारणकर अञ्जलिमें पुष्प लिये हुए (उस रथकी) तीन बार प्रदक्षिणाकर दान करे। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करे—