मत्स्य महापुराण

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१०२४ * मत्स्यपुराण *
| त्वमेव सर्वज्योतींषि दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम्।<br>ततस्त्वनेन मन्त्रेण धूपं दद्याद् विचक्षणः॥ २५<br>वनस्पतिरसो दिव्यो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः।<br>मया निवेदितो भक्त्या धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥ २६<br>ततस्त्वाभरणं दद्यान्महाभूषाय ते नमः।<br>अनेन विधिना कृत्वा सप्तरात्रं महोत्सवम्॥ २७<br>देवकुम्भैस्ततः कुर्याद् यजमानोऽभिषेचनम्।<br>चतुर्भिरष्टभिर्वापि द्वाभ्यामेकेन वा पुनः॥ २८<br>सपञ्चरत्नकलशैः सितवस्त्राभिवेष्टितैः।<br>देवस्य त्वेति मन्त्रेण साम्ना चाथर्वणेन च॥ २९<br>अभिषेके च ये मन्त्रा नवग्रहमखे स्मृताः।<br>सिताम्बरधरः स्नात्वा देवान् सम्पूज्य यत्नतः॥ ३०<br>स्थापकं पूजयेद् भक्त्या वस्त्रालङ्कारभूषणैः।<br>यज्ञभाण्डानि सर्वाणि मण्डपोपस्करादिकम्॥ ३१<br>यच्चान्यदपि तद्गेहे तदाचार्याय दापयेत्।<br>सुप्रसन्ने गुरौ यस्मात् तृप्यन्ति सर्वदेवताः॥ ३२<br>नैतद्विशीलेन च दाम्भिकेन<br>न लिङ्गिना स्थापनमत्र कार्यम्।<br>विप्रेण कार्यं श्रुतिपारगेण<br>गृहस्थधर्माभिरतेन नित्यम्॥ ३३<br>पाषण्डिनं यस्तु करोति भक्त्या<br>विहाय विप्राञ्श्रुतिधर्मयुक्तान्।<br>गुरुं प्रतिष्ठादिषु तत्र नूनं<br>कुलक्षयः स्यादचिरादपूज्यः॥ ३४<br>स्थानं पिशाचैः परिगृह्यते वा<br>अपूज्यतां यात्यचिरेण लोकैः।<br>विप्रैः कृतं यच्छुभदं कुले स्यात्<br>प्रपूज्यतां याति चिरं च कालम्॥ ३५ | चन्द्रमाकी ज्योति, बिजली, अग्नि और सभी प्रकारकी ज्योति हैं, आप इस दीपको ग्रहण करें।' फिर 'देव! यह वनस्पतियोंका अति उत्तम रस, दिव्य गन्धयुक्त और उत्तम गन्ध है, मैंने इसे भक्तिपूर्वक अर्पित किया है। आप इस धूपको ग्रहण करें।' इस मन्त्रका उच्चारणकर विचक्षण पुरुष धूपदान करे। तत्पश्चात् 'बहुमूल्य आभूषणोंसे विभूषित देव! आपको नमस्कार है।' इस भावके मन्त्रद्वारा आभूषण अर्पित करना चाहिये। इस प्रकार सात राततक महोत्सव कर श्वेत वस्त्रधारी यजमान पञ्चरत्नयुक्त तथा श्वेत वस्त्रसे परिवेष्टित चार, आठ, दो अथवा एक देवकुम्भके जलसे—'देवस्य त्वा०' (वाजस० सं० १।१०) इस मन्त्रसे या आथर्वण तथा साममन्त्रोंसे या नवग्रहयज्ञोंमें अभिषेकके समय प्रयुक्त होनेवाले मन्त्रोंसे अभिषेक करे। फिर स्नानकर देवताओंकी पूजा करनेके बाद स्थापना करानेवालेकी वस्त्र, अलंकार एवं आभूषणोंद्वारा पूजा करे। तत्पश्चात् सभी यज्ञपात्रों, मण्डपकी सामग्रियों तथा मण्डपमें अन्य जो कुछ भी दातव्य वस्तुएँ हों, उन्हें आचार्यको देना चाहिये; क्योंकि गुरुके प्रसन्न होनेपर सभी देवगण प्रसन्न हो जाते हैं। इस देवप्रतिमाके स्थापन-कार्यको शीलरहित, दम्भी और पाखंडीसे नहीं कराना चाहिये, प्रत्युत सदा श्रुतियोंके पारगामी एवं गृहस्थाश्रममें रहनेवाले ब्राह्मणद्वारा ही कराना उचित है। जो व्यक्ति केवल भक्तिके कारण वैदिक धर्मोंमें परायण विद्वान् पण्डितोंको छोड़कर अपने पाखण्डी गुरुको इस कार्यमें नियुक्त करता है, उसका कुल शीघ्र ही अपूज्य और नष्ट हो जाता है, उस स्थानपर पिशाचोंका आधिपत्य हो जाता है तथा लोग प्रतिमाको थोड़े ही दिनों बाद अपूज्य समझने लगते हैं। वैदिक ब्राह्मणोंद्वारा करायी गयी स्थापनासे देव-प्रतिमा कुलमें कल्याणकारिणी होती है और चिरकालतक लोग उसकी पूजा करते हैं॥ २४—३५॥ |
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे देवतास्नानं नाम सप्तषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २६७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें देवप्रतिमा-स्नान नामक दो सौ सड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २६७॥