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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1035 of 1098

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Page 1035
* अध्याय २६८ *१०२५

दो सौ अड़सठवाँ अध्याय

वास्तु-शान्तिकी विधि

ऋषय ऊचुः**ऋषियोंने पूछा—**सूतजी! समृद्धिकी इच्छा करनेवालोंको प्रासादों (राजगृह, देवमन्दिर आदि)-की रचना किस प्रकार करनी चाहिये? अब उनके प्रमाण और लक्षणोंको विस्तारपूर्वक बतलाइये॥ १॥
प्रासादाः कीदृशाः सूत कर्तव्या भूतिमिच्छता।<br>प्रमाणं लक्षणं तद्वद् वद विस्तरतोऽधुना॥ १
सूत उवाच**सूतजी कहते हैं—**ऋषिवृन्द! अब मैं प्रासादविधिका निर्णय बतला रहा हूँ। वास्तुके शरीरको जाननेवाला पुरुष वास्तुकी भलीभाँति परीक्षा कर लेनेके बाद (दोष दीखनेपर) बलिकर्म तथा समिधाओंद्वारा वास्तुकी शान्ति करे। जीर्ण प्रासादके उद्धार, वाटिकाके आरोपण, नूतन गृहमें प्रवेश, नवीन प्रासाद अथवा भवनके निर्माण, प्रासादपरिवर्तन, प्रासाद तथा गृहोंमें द्वारकी रचना—इन सभी अवसरोंपर विद्वान् पुरुषको पहले ही वास्तुकी शान्ति—पूजा करानी चाहिये। इसके लिये वास्तुके मध्यभागमें पृष्ठप्रदेशपर इक्यासी पदोंवाला चक्र बनाना चाहिये। फिर एक हाथ गहरे तथा चौड़े कुण्डमें, जो तीन मेखलाओंसे युक्त हो, जौ, काले तिल तथा दुग्धवाले (वट, पाकड़, पीपल, गूलर आदि) वृक्षोंकी समिधाओंद्वारा हवन करना चाहिये। हवनमें मधु और घृतसे संयुक्त पलाश या खदिरकी समिधाओंका या मधु-घृत-संयुक्त कुश और दूर्वाका अथवा पाँच बिल्व-फल या उसके बीजोंका उपयोग करना चाहिये। हवनके अन्तमें विविध भक्ष्य सामग्रियोंद्वारा वास्तुप्रदेशमें क्रमसे बलि तथा विशेष नैवेद्य भी देना चाहिये। ईशानकोणमें घृतसे संयुक्त नैवेद्य अग्निके लिये समर्पित करे। पर्जन्यके लिये फल-घृतसंयुक्त ओदन तथा जयके लिये पीली ध्वजा और आटेका बना हुआ कूर्म देना चाहिये। इन्द्रके लिये पञ्चरत्न तथा आटेका बना हुआ वज्र तथा सूर्यके लिये धूम्रवर्णका वितान और सत्तू देना चाहिये॥ २—११॥
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि प्रासादविधिनिर्णयम्।<br>वास्तौ परीक्षिते सम्यग् वास्तुदेहविचक्षणः॥ २
वास्तूपशमनं कुर्यात् समिद्भिर्बलिकर्मणा।<br>जीर्णोद्धारे तथोद्याने तथा गृहनिवेशने॥ ३
नवप्रासादभवने प्रासादपरिवर्तने।<br>द्वाराभिवर्तने तद्वत् प्रासादेषु गृहेषु च॥ ४
वास्तूपशमनं कुर्यात् पूर्वमेव विचक्षणः।<br>एकाशीतिपदं लिख्य वास्तुमध्ये च पृष्ठतः॥ ५
होमस्त्रिमेखले कार्यः कुण्डे हस्तप्रमाणके।<br>यवैः कृष्णतिलैस्तद्वत् समिद्भिः क्षीरवृक्षजैः॥ ६
पालाशैः खादिरैश्चापि मधुसर्पिःसमन्वितैः।<br>कुशदूर्वामयैर्वापि मधुसर्पिःसमन्वितैः॥ ७
कायस्तु पञ्चभिर्बिल्वैर्बिल्वबीजैरथापि वा।<br>होमान्ते भक्ष्यभोज्यैस्तु वास्तुदेशे बलिं हरेत्॥ ८
तद्वद्विशेषनैवेद्यमेवं दद्यात् क्रमेण तु।<br>ईशकोणे घृताक्तं तु शिखिने विनिवेदयेत्॥ ९
ओदनं सफलं दद्यात् पर्जन्याय घृतान्वितम्।<br>जयाय च ध्वजान् पीतान् पैष्टं कूर्मं च संन्यसेत्॥ १०
इन्द्राय पञ्चरत्नानि पैष्टं च कुलिशं तथा।<br>वितानकं च सूर्याय धूम्रं सक्तुं तथैव च॥ ११
सत्याय घृतगोधूमं मत्स्यं दद्याद् भृशाय च।<br>शष्कुलीश्चान्तरिक्षाय दद्यात् सक्तूंश्च वायवे॥ १२इसी प्रकार सत्यके लिये घी और गेहूँ, भृशको अन्न, अन्तरिक्षको पूड़ी, वायुको सत्तू और पूपाको लावा देना चाहिये। वितथको चना और ओदन, बृहत्क्षत्रको मधु और अन्न, यमको फलका गूदा और ओदन,
लाजाः पूष्णे तु दातव्या वितथे चणकौदनम्।<br>बृहत्क्षत्राय मध्वन्नं यमाय पिशितौदनम्॥ १३