मत्स्य महापुराण

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| * अध्याय २६७ * | १०२३ |
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| कुशाम्भसा ततः स्नानं देवस्यत्वेति कारयेत्।<br>फलोदकेन च स्नानमग्न आयाहि कारयेत्॥ १० | जलसे, ‘देवस्य त्वा०’ (वाजस० सं० १।१०) इस मन्त्रका उच्चारण कर कुशोदकसे तथा ‘अग्न आयाहि०’ (साम० सं० १।१) इस मन्त्रका उच्चारण कर प्रतिमाको स्नान करावे॥ १–१०॥ |
| ततस्तु गन्धतोयेन सावित्र्या चाभिमन्त्रयेत्।<br>ततो घटसहस्रेण सहस्रार्धेन वा पुनः॥ ११<br>तस्याप्यर्धेन वा कुर्यात् सपादेन शतेन वा।<br>चतुःषष्ट्या ततोऽर्धेन तदर्धार्धेन वा पुनः॥ १२<br>चतुर्भिरथवा कुर्याद् घटानामल्पवित्तवान्।<br>सौवर्णे राजतैर्वापि ताम्रैर्वा रीतिकोद्भवैः॥ १३<br>कांस्यैर्वा पार्थिवैर्वापि स्नपनं शक्तितो भवेत्।<br>सहदेवी वचा व्याघ्री बला चातिबला तथा॥ १४<br>शङ्खपुष्पी तथा सिंही ह्यष्टमी च सुवर्चला।<br>महौषध्यष्टकं ह्येतन्महास्नानेषु योजयेत्॥ १५<br>यवगोधूमनीवारतिलश्यामाकशालयः ।<br>प्रियङ्गवो व्रीहयश्च स्नानेषु परिकल्पिताः॥ १६<br>स्वस्तिकं पद्मकं शङ्खमुत्पलं कमलं तथा।<br>श्रीवत्सं दर्पणं तद्वन्नन्द्यावर्तमथाष्टकम्॥ १७<br>एतानि गोमयैः कुर्यान्मृदा च शुभया ततः।<br>पञ्चवर्णादिकं तद्वत् पञ्चवर्णं रजस्तथा॥ १८<br>दूर्वाः कृष्णतिलान् दद्यान्नीराजनविधिर्मतः।<br>एवं नीराजनं कृत्वा दद्यादाचमनं बुधः॥ १९<br>मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापापहं शुभम्।<br>ततो वस्त्रयुगं दद्यान्मन्त्रेणानेन यत्नतः॥ २०<br>देवसूत्रसमायुक्ते यज्ञदानसमन्विते।<br>सर्ववर्णे शुभे देव वाससी ते विनिर्मिते॥ २१<br>ततस्तु चन्दनं दद्यात् समं कर्पूरकुङ्कुमैः।<br>इममुच्चारयेन्मन्त्रं दीर्घपाणिः प्रयत्नतः॥ २२<br>शरीरं ते न जानामि चेष्टां नैव च नैव च।<br>मया निवेदितान् गन्धान् प्रतिगृह्य विलिप्यताम्॥ २३ | इसके बाद गायत्री-मन्त्रद्वारा सुगन्धित जलसे अभिमन्त्रित करे। फिर एक हजार या पाँच सौ या उसके आधे ढाई सौ या एक सौ पचीस या एक सौ या चौंसठ या उसके आधे बत्तीस या उसके आधे सोलह या आठ या अल्प वित्तवाला पुरुष चार कलशोंसे स्नान-क्रिया सम्पन्न करे। ये कलश यथाशक्ति सुवर्ण, चाँदी, ताँबा, पीतल, कांसा या मिट्टीके बने होने चाहिये। सहदेई, वच, व्याघ्री, बला, अतिबला, शङ्खपुष्पी, सिंही तथा आठवीं सुवर्चला—ये महौषधियाँ हैं, इनका महास्नानके समय प्रयोग करना चाहिये। जौ, गेहूँ, तिन्नी, तिल, साँवा, धान, प्रियङ्गु तथा चावल—ये अन्न भी स्नानकार्यमें उपयोगी कहे गये हैं। स्वस्तिक, पद्म, शङ्ख, उत्पल, कमल, श्रीवत्स, दर्पण और नन्द्यावर्त—इन आठ चित्रोंकी गोबर और शुद्ध मिट्टीसे कलापूर्ण रचना करें, फिर उन्हें पाँच प्रकारके रंग, पाँच प्रकारके चूर्ण, दूर्वा और काला तिलसे भर दे। तत्पश्चात् नीराजन—आरतीकी विधिसे नीराजन कर बुद्धिमान् पुरुष ‘गङ्गाका जल सभी पापोंका विनाशक और शुभदायक होता है’ इस भावके मन्त्रसे आचमन करावे। तदनन्तर—‘देव! आपके लिये बने हुए ये युगल वस्त्र देवनिर्मित सूत्रद्वारा बने हुए, यज्ञ तथा दानसे समन्वित, विविध वर्णोंवाले एवं परम रमणीय हैं, इन्हें आप ग्रहण करें,’ इस भावके मन्त्रका उच्चारण करते हुए यत्नपूर्वक दो वस्त्र समर्पित करे। इसके बाद हाथमें कुश लेकर प्रयत्नपूर्वक निम्नलिखित मन्त्रका उच्चारण करते हुए कपूर और केसरमिश्रित चन्दन लगाना चाहिये। मन्त्र इस प्रकार है—‘देव! मैं आपके शरीर और चेष्टाको किसी प्रकार भी नहीं जानता, अतः मेरे द्वारा समर्पित किये गये गन्धोंको ग्रहणकर आप स्वयं ही अनुलेपन कर लें’॥ ११–२३॥ |
| चत्वारिंशत् ततो दीपान् दद्याच्चैव प्रदक्षिणान्।<br>त्वं सूर्यचन्द्रज्योतींषि विद्युदग्निस्तथैव च॥ २४ | इसके बाद चालीस दीप प्रदान करना चाहिये और प्रदक्षिणा भी करनी चाहिये। उस समय निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे—‘देव! आप ही सूर्य और |