मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextबारहवां अध्याय। ४५६
यथा जातबलो वह्निर्दहत्यार्द्रानपि द्रुमान्।
तथा दहति वेदज्ञः कर्मजं दोषमात्मनः॥ १०१॥
वेदशास्त्रार्थतत्त्वज्ञो यत्र तत्राश्रमे वसन्।
इहैव लोके तिष्ठन् स ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ १०२॥
जो स्मृति वेदमूलक नहीं हैं, जो वैदिक देव-यज्ञादि को झूठा
बतलानेवाले ग्रन्थ हैं, उन सबको निष्फल और नरकगति देनेवाले
जानना चाहिए। वेद से भिन्न-मूलक जो ग्रन्थ हैं वे सब उत्पन्न होते
हैं और थोड़े समय में नष्ट होजाते हैं। वे आधुनिक होनेसे निष्फल
और असत्य हैं। चारों वर्ण, चारों आश्रम, तीनों लोक और भूत,
भविष्य, वर्तमान काल सब वेदहीसे प्रसिद्ध होते हैं। शब्द, स्पर्श, रूप,
रस, गन्ध ये पांच भी वेद से उत्पन्न हैं और सत्त्वादि गुणों के कर्म
से हैं। सनातन वेद यज्ञादि से चराचर विश्व का धारण और पा-
लन करता है। इसलिये वेद अधिकारी के परम कल्याण का साधन
है। सेनापति, राज्य, न्यायाधीश और सबका स्वामी वेदशास्त्रज्ञही
होता है। जैसे प्रज्वलित अग्नि गीले वृक्षों को भी भस्म
करडालता है वैसेही वेदज्ञ अपने कर्मदोषों को भस्म करडालता
है। वेद के तत्त्व को जाननेवाला चाहे जिस आश्रम में रहकर
इसीलोक में मोक्ष पाता है॥ ६५-१०२॥
अज्ञेभ्यो ग्रन्थिनः श्रेष्ठा ग्रन्थिभ्यो धारिणो वराः।
धारिभ्यो ज्ञानिनः श्रेष्ठा ज्ञानिभ्यो व्यवसायिनः॥१०३॥
तपो विद्या च विप्रस्य निःश्रेयसकरं परम्।
तपसा किल्विषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते॥ १०४॥
प्रत्यक्षं चानुमानं च शास्त्रं च विविधागमम्।
त्रयं सुविदितं कार्यं धर्मशुद्धिमभीप्सता॥ १०५॥
आर्षं धर्मोपदेशं च वेदशास्त्राऽविरोधिना।