Skip to content
SarvaKosh
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 598 of 649

Read in context
Page 598

४५८ मनुस्मृति ।
मोक्ष देनेवाला आत्मज्ञानरूप निवृत्त कर्म ये दो प्रकार के वै-
दिक कर्म होते हैं। इसलोक के और परलोक के सुख की कामना
से किया हुआ कर्म प्रवृत्त और निष्काम आत्मज्ञानार्थ किया कर्म
निवृत्त कहलाता है। प्रवृत्त कर्म के करने से देवताओं की समता
को और निवृत्त कर्म करने से पञ्चभूतों को उलांघ कर मोक्ष
पाता है। सब भूतों में आत्मा को और आत्मा में सब भूतों
को समान देखनेवाला आत्मयाजी मोक्ष को पाता है। द्विज
शास्त्रोक्त कर्मों को भी न कर सके तो ब्रह्मध्यान, इन्द्रियनिग्रह और
वेदाभ्यास ही करे। इन्हीं आचरणों से ही विशेषकर ब्राह्मण के जन्म
की सफलता है। द्विज आत्मज्ञान को पाकर ही कृतार्थ होता है,
अन्यथा नहीं। पितर, देवता और मनुष्यों के धर्म का मार्ग दिखाने
वाला वेद ही नेत्र है। वह मीमांसा आदि शास्त्रों के विचार विना
जानने में अशक्य है और अनन्तहै। यही मर्यादा है ॥८७-९४॥
या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः ।
सर्वास्ता निष्फलाःप्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताःस्मृताः॥६५॥
उत्पद्यन्ते व्ययन्ते च यान्यतोऽन्यानि कानिचित् ।
तान्यर्वाक्कालिकतया निष्फलान्यनृतानि च ॥ ९६ ॥
चातुर्वर्ण्यं त्रयो लोकाश्चत्वारश्चाश्रमाः पृथक् ।
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं वेदात्प्रसिद्ध्यति ॥ ९७ ॥
शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः ।
वेदादेव प्रसूयन्ते प्रसूतिगुणकर्मतः ॥ ६८ ॥
बिभर्त्ति सर्वभूतानि वेदशास्त्रं सनातनम् ।
तस्मादेतत्परं मन्ये यज्जन्तोरस्य साधनम् ॥ ६६ ॥
सेनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च ।
सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति ॥ १०० ॥