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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 600 of 649

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Page 600

४६० मनुस्मृति ।
यस्तर्केणानुसंधत्ते स धर्मं वेद नेतरः ॥ १०६ ॥
नैःश्रेयसमिदं कर्म यथोदितमशेषतः ।
मानवस्यास्य शास्त्रस्य रहस्यमुपदिश्यते ॥ १०७ ॥
अनाम्नातेषु धर्मेषु कथं स्यादिति चेद्भवेत् ।
यं शिष्टा ब्राह्मणा ब्रूयुः स धर्मः स्यादशङ्कितः ॥ १०८ ॥
धर्मेणाधिगतो यैस्तु वेदः सपरिवृंहणः ।
ते शिष्टा ब्राह्मणा ज्ञेयाः श्रुतिप्रत्यक्षहेतवः ॥ १०६ ॥
दशावरा वा परिषद्यं धर्मं परिकल्पयेत् ।
त्र्यवरा वाऽपि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत् ॥ ११० ॥
अज्ञों से ग्रन्थ पढ़े हुए श्रेष्ठ हैं, उनसे धारण करनेवाले श्रेष्ठ हैं।
उनसे भी अर्थ समझनेवाले श्रेष्ठ हैं । उनसे भी शास्त्रानुसार
आचरण करनेवाले श्रेष्ठ हैं। तप और विद्या ब्राह्मण का परम हित-
कारी है। ब्राह्मण तप से पाप नाश करता है और ब्रह्मविद्या
से मोक्ष पाता है। धर्म के तत्त्व को जानने की इच्छावाले प्रत्यक्ष
(श्रुति) अनुमान (स्मृति) और विविध शास्त्रों को भली
भाँति जानें। जो वेद और धर्मशास्त्र का वेद के अनुकूल तर्क
से विचार करता है वह धर्म को जानता है, दूसरा नहीं जा-
नता। इस प्रकार मोक्ष देनेवाले सब कर्म कहे गये हैं। अब इस
मानव धर्मशास्त्र के रहस्य का उपदेश करते हैं:—
रहस्य-उपदेश ।
जो धर्म इस शास्त्रमें नहीं कहे गये उनका निर्णय शिष्ट ब्राह्मणों
की आज्ञा से जो हो वही माननीय होता है। जिन्होंने साङ्ग वेद
धर्मभाव से अध्ययन किया हो उन वेद के प्रत्यक्ष प्रमाण भूत ब्रा-
ह्मणों को शिष्ट जानना चाहिए। कमसे कम दश सदाचारी ब्राह्मणों
की सभा या तीनही ब्राह्मणों की सभा जो धर्म बतलावें वही धर्म
जानना चाहिए ॥ १०३-११० ॥