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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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Page 241

तीसरा अध्याय।
ब्राह्मण के हाथ में ही तीन आहुति देवे, ब्राह्मण अग्निरूप है
ऋषियों का मत है ॥ २०६-२१२ ॥
अक्रोधनान् सुप्रसादान् वदन्त्येतान् पुरातनान् ।
लोकस्याप्यायने युक्ताञ्छाद्धेदेवान् द्विजोत्तमान्॥२१३॥
अपसव्यमग्नौ कृत्वा सर्वमावृतपरिक्रमम् ।
अपसव्येन हस्तेन निर्वपेदुदकं भुवि ॥ २१४ ॥
त्रींस्तु तस्माद्धविःशेषात्पिण्डान्कृत्वा समाहितः ।
औदकेनैव विधिना निर्वपेद्दक्षिणामुखः ॥ २१५ ॥
क्रोधरहित, प्रसन्नचित्त, वृद्ध और लोक की वृद्धि में तत्पर,
श्रेष्ठ ब्राह्मण श्राद्ध के पात्र होते हैं । अपसव्य होकर पितरों के
निमित्त अग्नि में दो आहुति देकर अपसव्य ही पूर्व दिशा से
दक्षिण को पिण्ड छोड़ने की भूमि पर जल छोड़े । हवन की बाक़ी
सामग्री का तीन पिण्ड बनाकर दक्षिणमुख दाहने हाथ से कुशों
के ऊपर पिण्ड छोड़ना चाहिए ॥ २१३-२१५ ॥
न्युप्य पिण्डांस्ततस्तांस्तु प्रयतो विधिपूर्वकम् ।
तेषु दर्भेषु तं हस्तं निमृज्याल्लेपभागिनाम् ॥ २१६ ॥
आचम्योदक्परावृत्य त्रिरायम्य शनैरसून् ।
षडृतूंश्च नमस्कुर्यात् पितॄनेव च मन्त्रवित् ॥ २१७॥
उदकं निनयेच्छेषं शनैः पिण्डान्तिके पुनः ।
अवजिघ्रेच्च तान्पिण्डान्यथान्युप्तान्समाहितः॥२१८॥
पिण्डेभ्यस्त्वल्पिकां मात्रां समादायानुपूर्वशः ।
तानेव विप्रानासीनान् विधिवत्पूर्वमाशयेत् ॥ २१९ ॥
पिण्डों के रखने के बाद वृद्ध प्रपितामह से लेकर ऊपर के
तीन लेपभागी पुरुषों की तृप्ति के लिए उन कुशों के पास ही हाथ
धोवे । फिर उत्तराभिमुख आचमन और तीन प्राणायाम धीरे से