मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 242 of 649
Read in context१०२ मनुस्मृति ।
करके छ ऋतुओं को और पितरों को नमस्कार करे। फिर पिण्ड-
दान के पात्र में शेष जल बचा हो उसको पिण्डों के पास धीरे
धीरे छोड़े और जिस क्रम से पिण्डों को रक्खा था उसी क्रम
से उठाकर सूंघे । पिण्डों में से थोड़ा थोड़ा भाग लेकर
प्रथम ब्राह्मणों को विधि से खिलावे अर्थात् जिस पिता के नि-
मित्त जो पिण्ड छोड़ा हो उस पिण्ड का भाग उसी पितर के
स्थान में बैठे हुए ब्राह्मण को खिलाना चाहिए ॥ २१६-२१९ ॥
ध्रियमाणे तु पितरि पूर्वेषामेव निर्वपेत् ।
विप्रवद्वापि तं श्राद्धे स्वकं पितरमाशयेत् ॥ २२० ॥
पिता यस्य निवृत्तः स्याज्जीवेच्चापि पितामहः ।
पितुः स नाम संकीर्त्य कीर्तयेत्प्रपितामहम् ॥ २२१ ॥
पितामहो वा तच्छ्राद्धं भुञ्जीतेत्यब्रवीन्मनुः ।
कामं वा समनुज्ञातः स्वयमेव समाचरेत् ॥ २२२ ॥
यदि पिता जीता हो तो श्राद्ध करनेवाला मरे हुए पितामह
आदि तीन पुरुषों का श्राद्ध करे या पितृ ब्राह्मण के स्थान में
अपने पिता को ही भोजन करादे। जिसका पिता मरगया हो और
पितामह जीता हो, वह पिता का नाम बोलकर प्रपितामह का
नाम बोले अर्थात् पिता और प्रपितामह दोनों का श्राद्ध करे।
या जीवित पितामह उस श्राद्ध का भोजन करे, यह मनुजी की
आज्ञा है । अथवा श्राद्धकर्ता पितामह की आज्ञा से आपही
प्रपितामह और वृद्धप्रपितामह का श्राद्ध करे ॥ २२०-२२२ ॥
तेषां दत्त्वा तु हस्तेषु सपवित्रं तिलोदकम् ।
तत्पिण्डाग्रं प्रयच्छेत स्वधैषामस्त्विति ब्रुवन् ॥ २२३ ॥
पाणिभ्यां तूपसंगृह्य स्वयमन्नस्य वर्द्धितम् ।
विप्रान्तिके पितॄन्ध्यायञ्छनकैरुपनिक्षिपेत् ॥ २२४ ॥
उभयोर्हस्तयोर्मुक्तं यदन्नमुपनीयते ।