Skip to content
SarvaKosh
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 240 of 649

Read in context
Page 240

१०० मनुस्मृति।
अवकाशेषु चोक्षेषु नदीतीरेषु चैव हि ।
विविक्तेषु च तुष्यन्ति दत्तेन पितरः सदा ॥ २०७ ॥
आसनेषूपक्लृप्तेषु बर्हिष्मत्सु पृथक् पृथक् ।
उपस्पृष्टोदकान् सम्यग्विप्रान्स्तानुपवेशयेत् ॥ २०८ ॥
इस कारण श्राद्ध में आरम्भ और समाप्ति देवतापूर्वक करे,
पित्रादिपूर्वक न करे । उसको करनेवाला वंशसहित नष्ट होजाता
है । एकान्त और पवित्र देश में गोबर से भूमि लीपकर उसमें
दक्षिण को झुकी वेदी बनावे । खुला स्थान, पवित्र देश, नदीतीर
या निर्जन देश में श्राद्ध करने से पितर प्रसन्न होते हैं। उस स्थान
में अलग अलग बिछे हुए कुशासनों पर निमन्त्रित ब्राह्मणों को
बैठाना चाहिए ॥ २०५-२०८ ॥
उपवेश्य तु तान् विप्रानासनेष्वजुगुप्सितान् ।
गन्धमाल्यैः सुरभिभिरर्चयेद्देवपूर्वकम् ॥ २०६ ॥
येषामुदकमानीय सपवित्रांस्तिलानपि ।
अग्नौ कुर्यादनुज्ञातो ब्राह्मणो ब्राह्मणैः सह ॥ २१० ॥
अग्नेः सोमयमाभ्यां च कृत्वाप्यायनमादितः ।
हविर्दानेन विधिवत्पश्चात्संतर्पयेत् पितॄन् ॥ २११ ॥
अग्न्यभावे तु विप्रस्य पाणावेवोपपादयेत् ।
यो ह्यग्निः स द्विजो विप्रैर्मन्त्रदर्शिभिरुच्यते ॥२१२॥
उन सदाचारी ब्राह्मणों को आसनों पर बैठाकर सुगन्ध, चन्दन,
पुष्प, धूप आदि से पहिले विश्वेदेव फिर पितरों का पूजन करे।
उसके बाद कुश और तिल मिला अर्घ्यजल दान करे और सब
की आज्ञा लेकर श्राद्ध करनेवाला ब्राह्मणों के साथ अग्नि में हवन
करे । पहले हवन से अग्नि, सोम और यम को तृप्त करे फिर अन्न
आदि हवि से पितरों को तृप्त करना चाहिए । यदि अग्नि न हो तो