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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 239 of 649

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Page 239

तीसरा अध्याय । ६६
हविष्मन्त अङ्गिरा के पुत्र, आज्यपा पुलस्त्य के पुत्र और सुका-
लिन् वशिष्ठ के पुत्र हैं। अग्निदग्ध, अनग्निदग्ध, काव्य, बर्हिषद्,
अग्निष्वात्त और सौम्य ये ब्राह्मणों के पितर हैं। ये पितरों के मुख्य
गण कहे गये हैं, इनके अनन्त जो पुत्र-पौत्र हैं उनको भी पितर
जानना चाहिए ॥ १६७-२०० ॥
ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितृभ्यो देवमानवाः ।
देवेभ्यस्तु जगत्सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः ॥ २०१ ॥
राजतैर्भाजनैरेषामथो वा राजतान्वितैः ।
वार्यपि श्रद्धया दत्तमक्षयायोपकल्प्यते ॥ २०२ ॥
देवकार्याद्द्विजातीनां पितृकार्यं विशिष्यते ।
दैवं हि पितृकार्यस्य पूर्वमाप्यायनं श्रुतम् ॥ २०३ ॥
तेषामारक्षभूतं तु पूर्वं दैवं नियोजयेत् ।
रक्षांसि हि विलुम्पन्ति श्राद्धमारक्षवर्जितम् ॥२०४॥
मरीचि आदि ऋषियों से पितर हुए हैं, पितरों से देवता और
मनुष्य हुए हैं। देवताओं से क्रम से स्थावर, जङ्गम रूप जगत्
उत्पन्न हुआ है। इन सब पितरों को चांदी के पात्र से वा चांदी
लगे पात्र से जलदान करने से अक्षय तृप्ति होती है। देवकार्य से
पितृकार्य द्विजों के लिए विशेष गिना जाता है। पितृश्राद्ध प्र-
धान कर्म है और देवकर्म उसका अङ्ग गिना जाता है। देवकर्म
पूर्व करने से पितृकर्म की पुष्टि होती है। पितृकर्म का रक्षक देव-
कर्म पूर्व करे, क्योंकि रक्षारहित श्राद्ध का राक्षस नाश कर
देते हैं ॥ २०१-२०४ ॥
दैवाद्यन्तं तदीहेत पित्र्याद्यन्तं न तद्भवेत् ।
पित्र्याद्यन्तं त्वीहमानः क्षिप्रं नश्यति सान्वयः ॥२०५॥
शुचिं देशं विविक्तं च गोमयेनोपलेपयेत् ।
दक्षिणाप्रवणं चैव प्रयत्नेनोपपादयेत् ॥ २०६ ॥