मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 18, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें१६ मनुस्मृति ।
उपदेक्ष्यति तज्ज्ञानं शिष्याणां ब्रह्मसंमितम् ॥
सर्ववेदान्तसारं च धर्मान् वेद निदर्शनान् ॥ ' इति ।
और ये शिष्यपरम्पराबोधक श्लोक हैं—
' नारायणं पद्मभुवं वशिष्ठं
शक्तिं च तत्पुत्रपराशरं च ।
व्यासं शुकं गौडपदं महान्तं
गोविन्दयोगीन्द्रमथास्य शिष्यम् ॥
श्रीशङ्कराचार्यमथास्य पद्म-
पादं च हस्तामलकं च शिष्यम् ।
तं तोटकं वार्त्तिककारमन्या-
नस्मद्गुरून् संततमानतोऽस्मि ॥ ' इति ।
और दादूपंथी विद्वच्छिरोमणि निश्चलदास ने अपने
विचारसागर के पांचवें तरंग में लिखा है—
' चारि यार मध्वादिक जे हैं
वेदविरुद्ध कहत सब ते हैं ।
यामें व्यासवचन सुनि लीजे
शंकर मतहि प्रमान करीजे ॥
कलिमें वेद अर्थ बहु करिहैं
श्रीशंकर शिव तब अवतरिहैं ।
जैन बुद्ध मत मूल उखारै
गंगा ते प्रभु मूर्ति निकारै ॥
जैसे भानु उदय उजियारो
दूरि करै जग में अंधियारो ।
सब वस्तुहिं ज्योंको त्यों भासै
संशौ और विपर्यय नासै ॥