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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 649 में से

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पृष्ठ 15

भूमिका । १३
सामबन्धेन बध्यते, कल्पेन कल्प्यते कर्मकाण्डानुपूर्व्या संपाद्यते,
तथैव ज्योतिषेण द्योत्यते प्रकृतिविकृत्युभयानुभयात्मनां यज्ञाना-
मनुष्ठानकालादेशेन प्रकाश्यते । '
वेदों के चार उपाङ्ग ।
वेद, वेदाङ्ग के समान वेदों के उपाङ्ग की नियत गणना
नहीं है उसका क्रम भिन्न भिन्न प्राप्त होता है । याज्ञवल्क्योक्त
क्रम पहले लिखा जा चुका है और यह दूसरा क्रम है—
‘अथ चत्वार्युपाङ्गानि वेदानां संप्रचक्षते ।
धर्मशास्त्रं पुराणं च मीमांसान्यायविस्तरः ॥’
ऐसी दशा में नाम क्रम की एकता नहीं हो सकती और
यहांपर मीमांसा से पूर्व तथा उत्तरमीमांसा का ग्रहण किया
जाता है न्याय से वैशेषिक का ग्रहण हो सकैगा; परंतु सांख्य
और योग का भी ग्रहण करना उचित है क्योंकि वह भी
न्याय आदि के समान आस्तिक-दर्शन हैं तो पुराण से सांख्य-
योग का ग्रहण हो सकेगा । अथवा वैशेषिक-न्याय, सांख्य-
योग, पूर्वमीमांसा-उत्तरमीमांसा, यह दार्शनिक विभाग स्वतन्त्र
है और यही षट्शास्त्र के नाम से प्रसिद्ध है ।
षट्शास्त्रों का संग्राहक श्लोक ।
‘न्यायवैशेषिके पूर्वं सांख्ययोगौ ततः परम् ।
मीमांसाद्वितयं पश्चादित्याहुर्दर्शनानि षट् ॥’
१। न्यायविस्तर । प्रमाणों से अर्थपरीक्षा के लिये शास्त्र ।
वह दो प्रकार का । एक न्याय दूसरा वैशेषिक । प्रमाणादि
षोडश-पदार्थवादी पञ्चाध्यायी गौतम मुनिकृत न्यायशास्त्र ।