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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 649 में से

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पृष्ठ 11

भूमिका । ६
शुक्लयजुर्वेद की माध्यंदिनीय-संहिता और शतपथ ब्राह्मण,
प्रसिद्ध है। संहितान्तर्गत ईशावास्य, ब्राह्मणान्तर्गत बृहदारण्यक
ये दो उपनिषद् प्रसिद्ध हैं । भगवान् याज्ञवल्क्य ने अपनी
स्मृति के प्रायश्चित्ताध्याय में लिखा है कि मैंने जो सूर्य से
आरण्यक पाया वह आत्मज्ञानार्थ विचारने योग्य है ।
‘ज्ञेयं चारण्यकमहं यदादित्यादवाप्तवान्’ ( ११० श्लो० )
यजुर्वेद के शुक्लत्व में यह कारण है-
व्यास के शिष्य वैशंपायन ने याज्ञवल्क्य आदि अपने
शिष्यों को यजुर्वेद पढ़ाया । एक समय किसी कारण से क्रुद्ध
हो वैशंपायन ने याज्ञवल्क्य से कहा कि तुम हमारे से जो पढ़ा
है उसको वापस करदो । तब याज्ञवल्क्य ने पढ़ी हुई विद्याको
योगबल से मूर्तिमती बनाकर उगल दिया । उगली हुई
अङ्गार के समान ) यजुर्विद्या को वैशंपायन की आज्ञा से
अन्य शिष्यगण तित्तिर बनकर चुनलिया । तबसे ये यजु-
र्मन्त्र उगल देनेके कारण कृष्णयजु और उनको चुननेवाले
शिष्यगण तैत्तिरीय कहाये । वाद विद्यावियोग से दुःखित
याज्ञवल्क्य ने सूर्य की आराधना से जो दूसरे यजुर्मन्त्र पाये
उनकी शुक्लयजुः संज्ञा पड़ी । योगीश्वर-याज्ञवल्क्य ने शुक्ल-
यजुर्वेद को उक्त कण्व, मध्यंदिन आदि पंद्रह शिष्यों को पढ़ाया ।
३ । सामवेद के शाखाभेद ।
सामवेद की हज़ार शाखा थीं यह व्याकरण-महाभाष्यमें
लिखा है । उनमें से ये शाखाभेद ज्ञात हैं-राणायनीय,
१ योग की शक्ति जानने के लिये पातञ्जलदर्शन का विभूतिपाद देखो ।
२ यह वृत्त शुक्लयजुर्वेद के भाष्यारम्भ में लिखा है ।