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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

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Devanagarihipublished120 pages

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दोड़ भुजा काष्ठ जेहि उरेहा। बैर न छूटे सो गहि देहा ॥
जो कोई जीव जोर कर मारा। तासु जन्म किमि हो निस्तारा ॥
राम कृष्ण तैं को बड़ आही। बैर घात तासों न रहाही ॥
कृषी करै किसान जस भाऊ। ऐसी दसों जन्म निर्माऊ ॥
दसों जनम ऐसे ही बीते। तासों कहै कि मुक्ति करीते ॥
बूझो नहिं चरित्र भगवाना। तीन युग गये काल नियराना ॥
है बड़ ठाकुर ज्योति स्वरूपा। तिन सब रच्यो मही औ भूपा ॥
आप स्वार्थी तिनहू मारे। ज्यों नकटी विश्वासही वारे ॥

राम और कृष्ण से भला कौन बड़ा है! पर उन्हें भी जीव हत्या का बदला देना पड़ा। फिर साधारण आदमी अगर किसी को मारता है तो उसका कल्याण कैसे हो सकता है! दसों अवतार ऐसे ही बीते, पर कोई भी तीन युग तक निरंजन का खेल नहीं समझ सका।

धर्मदास कहैं सुनौं गुसाई। दसों जन्म कहि मोहि सुनाई ॥
कल्प अनेक निरंजन राजा। आगे कैसा करि है साजा ॥
सो सब स्वामी मोहि जनाओ। उत्पत्ति प्रलय भाव बताओ ॥
उत्पत्ति प्रलय सुनौं तुम पाही। कहौ सबै जो संशय जाही ॥

धर्मदास जी ने पूछा कि निरंजन का राज्य तो अनेक कल्प तक है, फिर आगे वो कैसे सृष्टि को सँवारता है? मुझे उत्पत्ति और प्रलय का पूरा भेद दो, जिससे मेरा संशय मिट सके।

चारौं युग हैं रहट स्वभाऊ। सो अब तोहि कहौं समुझाऊँ ॥
चारौं युग अंत जब होई। वर्षे अग्नि निरंजन सोई ॥
पृथ्वी जार करै सब पानी। रहै स्वर्ग सो कहौ निशानी ॥
रहै जो देव तैंतीस करोरी। रहै सब तपसी तपकी जोरी ॥
चंद्र सूर्य तारागण झारी। जबही देह तजै मुख चारी ॥
विष्णु बीतही दस अवतारा। नहिं शिव बीत योग जो धारा ॥
यहि विधि बहत्तर चौकड़ी जाई। सेवा फल पावै अन्याई ॥
उत्पत्ति करै पुन प्रथम स्वभाऊ। ऐसे भवसागर निर्माऊ ॥