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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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इसी को कहते हैं। फिर ऊपर हृदय स्थान पर शिव-लोक है। यहाँ शिवजी सहित पार्वती का वास है। इसी स्थान से ही 70 प्रकार की धुने पैदा होती हैं। जो कि अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग आवाज़ों में सुनाई देती हैं। संहार का कार्य यही से है। जब हमें गुस्सा आता है तो हृदय से ही आता है। इसके ऊपर कण्ठ स्थान पर शक्ति-लोक है। यहाँ पर आद्य-शक्ति का वास है। यही माया है। फिर आज्ञा चक्र पर आत्म-लोक है। यहाँ आत्मा रहती है। इसके ऊपर सहस्रसार चक्र पर निरंजन-लोक है। यहाँ इस ब्रह्माण्ड का राजा मन रहता है। यही काल-पुरुष है। सात-सात करोड़ योजन एक से एक चक्र पर दूरी है। इस प्रकार इस मन की बड़ी विशाल सीमा है।

यह संसार काल-पुरुष का देश है। यहाँ पर कुछ भी आत्मा के हित में नहीं है। वो सबको यहाँ पर दुख दे रहा है। लोग अवतारों की महिमा गाते हैं, पर साहिब कह रहे हैं कि वो भी उसी की सीमा में हैं। तीन-लोक में जो भी है, सब काल के दायरे में है।

यह हरदो यहाँ काल पुरुष के हैं हिजारे ।
हर सिम्त व हर जाय में यम जाल पसारे ॥
यक लोक व यक वेद दो दरिया के किनारे ।
सैयाद के काबू में हैं सब जीव बेचारे ॥
चलती है यहाँ तेग व तलवार दो धारे ।
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥

कह रहे हैं कि यहाँ सब काल का ही है। हर शै में उसका जाल फैला हुआ है। दुनिया के सब लोग उस क्रूर के काबू में हैं। इसलिए हे हंस! तू हमारे देश में चल। आगे कह रहे हैं—

जब भूल गया आदम को आपही आपा ।
पावन्द हुवा तिफली जवानी व बुढ़ापा ॥
सबपर है लगा मलिक मौत मोह व छापा ।
है आग लगी बेशः जलेगा यह सरापा ॥