मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextतीन लोक में मन का राज
तीन लोक में मनहिं विराजी, ताहि न चीहनत पंडित काजी
इस मन की सीमा देखते हैं। मन ब्रह्माण्ड का राजा है; अतः इसकी सीमा कोई छोटी नहीं है। भौतिक शक्तियों द्वारा इस मन से पार कभी भी नहीं पाया जा सकता। वैज्ञानिक लोग अभी मंगल ग्रह तक भी नहीं पहुँच पा रहे हैं। यदि वैज्ञानिक लोग पारपाइन्डर जैसे यान के माध्यम से स्वर्ग तक भी जाना चाहें तो पृथ्वी से स्वर्ग तक की दूरी को देखते हुए ऐसा यान करीब 500 साल में भी वहाँ नहीं पहुँच सकता, चाहे वो एक ही गति से क्यों न चलता रहे। यदि किसी पैदा हुए बच्चे को पूरी व्यवस्था के साथ उस यान में सुरक्षित भेज दिया जाए तो वह बच्चा बूढ़ा होकर मर भी जाएगा, लेकिन वहाँ नहीं पहुँच पाएगा। फिर मन की सीमा तो बड़ी विशाल है।
मन की सीमा को जानने के लिए इस ब्रह्माण्ड की संरचना को समझना होगा। जो पिण्ड में है, वही ब्रह्माण्ड में है। हमारी जंघाओं के नीचे सात लोक हैं, जिन्हें सात पाताल भी कहा जाता है—अतल, वितल, सुतल, तलालत, महातल, रसातल और पाताल। इसके ऊपर फिर सात लोक और हैं। पहले गुदा द्वार पर सिद्ध-लोक है। यहाँ पर गणेश जी का वास है। यहाँ मात्र इच्छा से सब कार्य होते हैं। इसके बाद शिशिन्द्रिय पर ब्रह्म-लोक है। यहाँ ब्रह्माजी और सावित्री जी का वास है। सृजन का कार्य यहीं से है। इसके ऊपर फिर विष्णु लोक है, जो नाभि स्थान पर है। यहाँ विष्णु जी सहित लक्ष्मी जी का वास है। स्वर्ग