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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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समाधि, ट्रेन-समाधि ले और कब समाधियों की संख्या में वृद्धि हो; क्योंकि अभी तक जल-समाधि और अग्नि-समाधि के खिताब ही बाँटे गये हैं।

कहने का भाव है कि तुरीया अवस्था ऐसी कायरता से प्राप्त नहीं होती। इसमें इंगला और पिंगला को लय कर देते हैं। इसमें साधक सब चिंताओं से मुक्त हो जाता है, क्योंकि मन, बुद्धि आदि का निग्रह हो जाता है। नींद में है तो भी चिंताओं में डूबा है, पर इसमें चिंतामुक्त हो जाता है। इसमें जाने के बाद साधक आन्तरिक जगत् को देखने में सक्षम हो जाता है। पर यह भी माया की भ्रमांक अवस्था है।

इसके बाद तुरीयातीत अवस्था आती है, जिसमें योगी लोग पहुँच जाते हैं। इसमें आत्मा बहुत चेतन हो जाती है और मन मात्र जीवित होता है। वास्तव में यह भी भ्रम है।

तुरीयातीत से परे एक अवस्था है, जिसमें योगेश्वर लोग पहुँचते हैं। इसमें मन अत्यंत सूक्ष्म होता है, पर होता है।

इसमें बड़ा अद्भुत शरीर मिलता है। इस शरीर में हाथ नहीं होते हैं, लेकिन फिर भी साधक अपने कार्य करता है। इसमें पैर भी नहीं होते, पर फिर भी साधक चलता है। गोस्वामी जी इस अवस्था को बड़े सुन्दर ढंग से बता रहे हैं—

पद बिनु चलै, सुनै बिनु काना । कर बिनु कर्म, करै विधि नाना ।
आनन रहित, सकल रस भोगी । बिन वाणी, वक्ता बड़ योगी ।
तन बिन परस, नैन बिन दरसे । गहे ज्ञान सब शेख विशेषे ।
यह विधि सब अलौकिक करनी । महिमा जाए कबन विधि वरनी ॥

यह ऐसी अवस्था है कि यहाँ देखा, वहीं पहुँच जाता है। लेकिन इस अवस्था में भी आत्मा अपने मूल रूप में नहीं आ पाती है; इसलिए ये सब अवस्थाएँ भ्रमांक हैं। मन सूक्ष्म रूप में रहता है। इस तरह मन और माया का बड़ा विशाल भ्रम है, जिसमें बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, संन्यासी, तपस्वी आदि भी झूल रहे हैं।