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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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मन का परिवार


आओ, मन के परिवार की तरफ चलते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार से ही मन का शरीर है। इन पाँचों का अपना-अपना परिवार है। इस तरह मन का एक बहुत बड़ा परिवार है। इन सबने मिलकर आत्मा को कसकर पकड़ा हुआ है। इस पर साहिब कह रहे हैं—

बहु बन्धन ने बांधिया, एक विचार जीव।
जीव विचार क्या करे, जो न छुड़ावे पीव॥

साहिब कह रहे हैं कि यह जीवात्मा अनेक बंधनों से बँधी हुई है। यह तो तभी छूटकर अपने देश जा सकती है, जब मालिक स्वयं आकर इसे छुड़ा ले जाए।

सबसे पहले काम की तरफ चलते हैं। यह काम, सभी को अपने वश में किया हुआ है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों को भी यह काम नचाता आया है। काम का भी परिवार है। काम की स्त्री है—रति। यह रति क्या है? संभोग क्रिया ही रति है। काम की यही पत्नी है। दोनों मिलकर वार करते हैं। ये दुश्मन ऐसे हैं कि दिखाई भी नहीं देते, वार पूरा करते हैं। फिर लालच इसका पुत्र है। जहाँ ये सब नहीं, वहाँ संभोग नहीं। फिर लोलुपता यानी उसी में रहना। तू-ही-तू बस। यह लोलुपता है। यह भी काम की बहू है। किसी से कोई लड़ाई करे तो उसके घर के सारे सदस्य भिड़ जायेंगे, एक हो जायेंगे। इस तरह ये सब भिड़ते हैं।

प्रबल अविद्या का परिवारा॥

गोस्वामी जी रामायण में बोल रहे हैं—