मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextइन सब मिल जीवहि घेरा ॥
ये दिख नहीं रहे हैं। इन्होंने आत्मा को घेरा है। आत्मा यहाँ बँधी है। वो पीड़ित है। ये समझ नहीं आ रहे हैं। बड़े बारीक दुश्मन से पाला पड़ा है।
एक मनोवैज्ञानिक मिला; वो एक ही सवाल में ढेर हो गया। मैंने कहा कि मन क्या है? कहाँ रहता है? जब पूरी बात हुई तो कहने लगा कि महाराज, जो बात आप कर रहे हैं, वो आजतक किसी स्लेबस में नहीं है।
जब यह काम मनुष्य पर सवार होता है तो उसे कुछ भी होश बाकी नहीं रहने देता। कामातुर मनुष्य बड़े-बड़े अनर्थक कार्य कर डालता है। काम ने सभी को अपने अधीन किया है।
एक पौराणिक कथा है कि 'नेमि' नाम का एक ऋषि काम के प्रताप से बचने के लिए जंगल में जाकर छिप गया। वहाँ ज़मीन के भीतर एक खड्ड में बैठ कर तप करने लगा। उसने सोचा कि शरीर में किसी भी तरह विषय-विकार उत्पन्न न हों, इसलिए रोटी खाना भी छोड़ दिया। वो दो-तीन दिन में एक बार ही उस खड्ड से बाहर आता था और वहाँ एक नीम के पेड़ को थोड़ा चाटकर ही अपना काम चलाता था। तभी किसी राजा के यहाँ यज्ञ का आयोजन हुआ। सब पंडितों को बुलाया गया। पंडितों ने राजा से कहा, हे राजन्! यदि नेमि ऋषि (शृंगी ऋषि) इस इतने बड़े यज्ञ का भोग लगा लेगा तो निश्चय ही यह यज्ञ सफल हो जाएगा। अब समस्या यह थी कि उसे बुलाकर लाए कौन! नेमि ऋषि तो किसी के यहाँ आता जाता ही नहीं था। राजा के महल में एक वेश्या रहती थी। उसने ऋषि को बुला लाने का दायित्व अपने ऊपर लिया। इसके लिए उसने कुछ समय माँगा। राजा की आज्ञा पाकर वेश्या वहाँ जंगल में आयी। वहाँ पहुँचकर वह एक स्थान पर छिपकर ऋषि के खड्ड से बाहर आने का इंतजार करने लगी। तीसरे दिन ऋषि ने बाहर आकर वहाँ नीम के पेड़ को दो-तीन बार चाटा और वापिस अपने खड्ड में चला गया। वेश्या