मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextहम बीते हुए दिनों को याद करते हैं। पचास साल, सौ साल पुरानी बातें भी याद आ जाती हैं, पर कभी भी यह चित्त प्रभु की याद नहीं आने देता। यह गम्भीर विषय है। हम कहीं उलझे हुए हैं। हमें इस पर गहराई से विचार करना है।
चौथा रूप है—अहंकार। इसका काम है—क्रिया करना। उदाहरण के लिए मन ने इच्छा की कि आम खाना है। इस पर बुद्धि फैसला करती है। पहले देखती है कि आम खरीदने के लिए पैसे भी हैं या नहीं। यदि पैसे ही नहीं हैं तो बुद्धि मन से कह देती है—ओ मन! पैसे नहीं हैं, आम नहीं खा सकते। मन शांत हो जाता है। मान लो कि आम खरीदने के लिए पैसे हैं। बुद्धि फौरन फैसला करती है—हाँ, आम खायेंगे। अब आम कहाँ मिले। यह बताता है चित्त। हमने चलते-फिरते कहीं आम की दुकान देखी थी। चित्त में यह बात बैठ गयी थी; उसे याद आ गया। अब फिर हम चलकर आम खरीदने के लिए जाते हैं। यही अहंकार कहलाता है।
<!-- image: Three decorative floral symbols arranged horizontally. -->“वेद चारों नहीं जानत सत्य पुरुष कहानियां ॥”
क्या कहते वेद ?
- ऋग्वेद—परमात्मा निराकार है।
- यजुर्वेद—परमात्मा साकार है।
- अथर्ववेद—कर्म ही परमात्मा है।
- साम वेद—आत्मा ही परमात्मा है।