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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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हैं जल में। उनमें एक-दो लाख किस्म के आप देख सकते हैं खुली आँखों से, बाकी दिखाई नहीं देंगे। इसी तरह—मन को कोई देख न पाए। मन का कार्यक्षेत्र बहुत बड़ा है। यह बहुत खतरनाक शक्तियों से सम्पन्न है। मन बहुत जल्दी से किसी को समझ में नहीं आता है।

सूक्ष्म रूप में मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार मन के रूप हैं। प्रत्येक मानव शरीर में मन चार रूपों में स्थित है—मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। ये चारों अपने-अपने तरीके से आत्मा को भ्रमित कर रहे हैं। जैसे पानी के तीन रूप हैं—तरल, ठोस तथा वाष्प; लेकिन तत्व रूप से तीनों एक ही हैं; बर्फ भी पानी ही है और वाष्प भी; इसी तरह मन के चार रूप हैं, पर मूल रूप से एक ही मन है। जब हमारा मन कोई इच्छा करता है तो यह मन कहलाता है। सारी इच्छाएँ मन से हैं। आत्मा कोई इच्छा नहीं करती है। आत्मा को किसी भी पदार्थ की कोई ज़रूरत नहीं है, वो किसी पर आश्रित ही नहीं है, वो अपने आप में परिपूर्ण और आनन्दमयी है, उसे कुछ नहीं चाहिए, फिर इच्छा क्या करेगी!

देखते हैं कि यह मन कैसी इच्छाएँ करता है। विचार करने पर पता चलता है कि मन मूल रूप से हमारे शरीर के उपयुक्त इच्छाएँ ही करता है। कभी भी यह मन आत्मा के कल्याण के लिए आगे आने वाला नहीं है। कभी-कभी हम बच्चों को अच्छी तालीम दिलवाकर बड़ा आदमी बनाना चाहते हैं। कभी अन्य-अन्य इच्छाएँ करते हैं। सोचो! क्या यह सब इच्छाएँ आत्मा कर रही है? नहीं! आत्मा का कोई रिश्ता-नाता नहीं है। जगत के सब रिश्ते मन बनाता है। सदी-गर्मी से बचने के लिए हम घर बनाते हैं। आत्मा को सदी-गर्मी लगती ही नहीं; सदी-गर्मी तो शरीर को लगती है, फिर आत्मा को क्या ज़रूरत पड़ी है, किसी घर की! कभी-कभी हम कहते हैं, हमारी आत्मा जलेबी खाने को कह रही है, हलवा-पूरी खाने को कह रही है। क्या यह ठीक बात है? नहीं। हमारी आत्मा कुछ भी नहीं खाती। इसमें तो मुँह ही नहीं है; खायेगी क्या! यह तो मन और इन्द्री का समझौता था। इन्द्री को मन ने ही उत्तेजित किया।