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मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

by सतगुरु मधु परमहंस जी

Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)

Devanagarihipublished120 pages

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इन्द्री के स्वार्थ की पूर्ति के लिए मन ने कार्य किया और इन्द्री मन की आज्ञा के पालन में जुट गयी। आत्मदेव को यहाँ पर धोखा दिया गया। उसने अपने को इन्द्री मान लिया और उसके स्वार्थ की पूर्ति में अपनी ताकत का सहयोग दिया। लोग कहते हैं कि दुनिया में सात अजूबे पर मुझे दुनिया में एक ही अजूबा नज़र आ रहा और वो यह कि आत्मा अपने को शरीर मान रही है। क्या कोई टॉवर कौतुक है! क्या कोई ब्रिज कौतुक है! नहीं है कौतुक। कौतुक है तो बस एक ही। इस आत्मा को भूख नहीं लगती, प्यास नहीं लगती; इसका कोई मां-बाप, रिश्ता-नाता नहीं। कितना बड़ा कौतुक है! इसी को साहिब अपने शब्दों में कह रहे हैं—

मन फूला-फूला फिरे जगत में, कैसा नाता रे।
माता कहे है पुत्र यह मेरा, बहिन कहे बीरन मेरा रे।
भाई कहे यह भुजा हमारी, नारी कहे नर मेरा रे।
पेट पकड़कर माता रोवे, बाँह पकड़कर भाई रे।
लपटि झपटि तिरिया रोवे, हंस अकेला जाई रे॥

हम सभी सैद्धान्तिक रूप से तो स्वीकार करते हैं कि 'आत्मा अमर है'। हम ठीक से समझते हैं कि हमारी आत्मा इस भवसागर में जब तक पड़ी रहेगी, यह बंधन में रहेगी। तभी तो हम सब भवसागर से छूटने का प्रयास करते हैं, आत्मा की मुक्ति की बात करते हैं। हम सभी सैद्धान्तिक रूप से शरीर को नाशवान् भी मानते हैं, क्योंकि हम देखते हैं कि जो भी शरीरधारी हुए हैं, सब एक-एक करके जा रहे हैं। हमसे पहले जो शरीरधारी हुए, कोई भी नज़र नहीं आता, चाहे वे बड़े-बड़े महापुरुष ही क्यों न थे, उन्हें भी एक बिन्दु पर पहुँचकर इस शरीर को छोड़ना पड़ा था। इसलिए हम सब सैद्धान्तिक रूप से मानते हैं कि शरीर नाशवान् है। लेकिन विडम्बना यह है कि व्यवहार में हम बिल्कुल विपरीत जा रहे हैं। व्यवहार में तो हम 'आत्मा' नाम की कोई चीज़ मान ही नहीं रहे हैं, क्योंकि हम आत्मा का व्यवहार नहीं कर रहे, और न ही हम शरीर को