मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
by सतगुरु मधु परमहंस जी
Source: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (origin)
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Read in contextनियंत्रण में नहीं है तो सूक्ष्म में कभी भी नहीं हो सकता है। पहले इंद्रियों को चेक कर लेना। इंद्रियों से ही आदमी को जाना जा सकता है कि इसका मन नियंत्रण में है या नहीं है।
अगर कोई यह कहे कि उसका मन अमुक बात सुनकर निर्मल हो गया, अमुक कथा सुनकर उसका मन निर्मल हो गया, कहीं जाकर या तीर्थ में नहा कर मन निर्मल हो गया तो इसमें शंका है। कभी नहीं हो सकता मन ऐसे निर्मल। अगर दो डुबकियाँ लगाने से मन निर्मल हो जाए तो कहना क्या। फिर तीर्थों में रहने वाले ठगी, छल, कपट कैसे कर सकते हैं। इससे सिद्ध हो रहा है कि मन इतनी जल्दी निर्मल होने वाला नहीं है। मन को काबू करना है।
सौ मन साबुन से एक कोयला उजला नहीं हो सकता। लेकिन कोई अगर कहे कि कोयले को धोकर हमने सफेद कर लिया तो हम मानने के लिए तैयार नहीं होंगे। पर कोई कहे कि मन को निर्मल कर लिया, हम किसी भी हालत में मानने को तैयार नहीं होंगे। मन निर्मल हो ही नहीं सकता है। काबू करना, इस पर सवारी करना, इस पर नियंत्रण करना।
मन पर काबू कैसे? मन नितांत खराब चीज है। मन का स्थूल रूप इंद्रियाँ अगर सक्रिय हो रही हैं, अपने अपने विषयों की तरफ दौड़ रही हैं तो मन मोटा हो जाता है। मन को पोषण इंद्रियों से मिलता है।
मन के चलाए तन चले, ताको सर्वस्व जाए॥
जिसका भी तन मन के चलाए चल रहा है, सर्वस्व नाश हो जाएगा।
जो भी आदमी मन का गुलाम है, वो अच्छा नहीं है। इसलिए इस मन पर नियंत्रण करना। ये कान अपनी बढ़ाई चाहते हैं, इन पर नियंत्रण करना।
ऐसे मन साधारणतया समझ में नहीं आएगा। वातावरण में बहुत से जीवाणु हैं। पानी में अनेक प्रकार के कीड़े हैं। नौ लाख किस्म के जीव