महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextषड्विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका चिन्तित होकर भीमसेनको अर्जुन और सात्यकिका पता लगानेके लिये भेजना
संजय उवाच
व्यूहेष्वालोड्यमानेषु पाण्डवानां ततस्ततः ।
सुदूरमन्वयुः पार्थाः पञ्चालाः सह सोमकैः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! जब द्रोणाचार्य पाण्डवोंके व्यूहोंको इस प्रकार जहाँ-तहाँसे रौंदने लगे, तब पार्थ, पांचाल तथा सोमक योद्धा उनसे बहुत दूर हट गये ॥ १ ॥
वर्तमाने तथा रौद्रे संग्रामे लोमहर्षणे ।
संक्षये जगतस्तीव्रे युगान्त इव भारत ॥ २ ॥
भरतनन्दन! वह रोमांचकारी भयंकर संग्राम प्रलयकालमें होनेवाले जगत्के भीषण संहार-सा उपस्थित हुआ था ॥ २ ॥
द्रोणे युधि पराक्रान्ते नर्दमाने मुहुर्मुहुः ।
पञ्चालेषु च क्षीणेषु वध्यमानेषु पाण्डुषु ॥ ३ ॥
नापश्यच्छरणं किञ्चिद् धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
चिन्तयामास राजेन्द्र कथमेतद् भविष्यति ॥ ४ ॥
जब द्रोणाचार्य युद्धमें पराक्रम प्रकट करके बारंबार गर्जना कर रहे थे, पांचाल वीरोंका विनाश हो रहा था और पाण्डव-सैनिक मारे जा रहे थे, उस समय धर्मराज युधिष्ठिरको कोई भी अपना आश्रय या रक्षक नहीं दिखायी दिया। राजेन्द्र! वे सोचने लगे कि यह कैसे होगा? ॥ ३-४ ॥
ततो वीक्ष्य दिशः सर्वाः सव्यसाचिदिदृक्षया ।
युधिष्ठिरों ददर्शार्थ नैव पार्थं न माधवम् ॥ ५ ॥
तदनन्तर युधिष्ठिरने सव्यसाची अर्जुनको देखनेकी इच्छासे सम्पूर्ण दिशाओंमें दृष्टि दौड़ायी; परंतु उन्हें कहीं भी अर्जुन और सात्यकि नहीं दिखायी दिये ॥ ५ ॥
सोऽपश्यन् नरशार्दूलं वानरर्षभलक्षणम् ।
गाण्डीवस्य च निर्घोषमशृण्वन् व्यथितेन्द्रियः ॥ ६ ॥
वानरश्रेष्ठ हनुमान्के चिह्नसे युक्त ध्वजवाले पुरुषसिंह अर्जुनको न देखकर और उनके गाण्डीवका गम्भीर घोष न सुनकर उनकी सारी इन्द्रियाँ व्यथित हो उठीं ॥ ६ ॥
अपश्यन् सात्यकिं चापि वृष्णीनां प्रवरं रथम् ।
चिन्तयाभिपरीताङ्गो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ७ ॥