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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

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चतुर्थोऽध्यायः

भीष्मजीका कर्णको प्रोत्साहन देकर युद्धके लिये भेजना तथा कर्णके आगमनसे कौरवोंका हर्षोल्लास

संजय उवाच

तस्य लालप्यतः श्रुत्वा कुरुवृद्धः पितामहः।
देशकालोचितं वाक्यमब्रवीत् प्रीतमानसः॥ १॥
संजय कहते हैं— राजन्! इस प्रकार बहुत कुछ बोलते हुए कर्णकी बात सुनकर कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्मने प्रसन्नचित्त होकर देश और कालके अनुसार यह बात कही—॥ १॥

समुद्र इव सिन्धूनां ज्योतिषामिव भास्करः।
सत्यस्य च यथा सन्तो बीजानामिव चोर्वरा॥ २॥
पर्जन्य इव भूतानां प्रतिष्ठा सुहृदां भव।
बान्धवास्त्वानुजीवन्तु सहस्राक्षमिवामराः॥ ३॥
'कर्ण! जैसे सरिताओंका आश्रय समुद्र, ज्योतिर्मय पदार्थोंका सूर्य, सत्यका साधु पुरुष, बीजोंका उर्वरा भूमि और प्राणियोंकी जीविकाका आधार मेघ है, उसी प्रकार तुम भी अपने सुहृदोंके आश्रयदाता बनो। जैसे देवता सहस्रलोचन इन्द्रका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार समस्त बन्धु-बान्धव तुम्हारा आश्रय लेकर जीवन धारण करें॥ २-३॥

मानहा भव शत्रूणां मित्राणां नन्दिवर्धनः।
कौरवाणां भव गतिर्यथा विष्णुर्दिवौकसाम्॥ ४॥
'तुम शत्रुओंका मान मर्दन करनेवाले और मित्रोंका आनन्द बढ़ानेवाले होओ। जैसे भगवान् विष्णु देवताओंके आश्रय हैं, उसी प्रकार तुम कौरवोंके आधार बनो॥ ४॥

स्वबाहुबलवीर्येण धार्तराष्ट्रजयैषिणा।
कर्ण राजपुरं गत्वा काम्बोजा निर्जितास्त्वया॥ ५॥
'कर्ण! तुमने दुर्योधनके लिये विजयकी इच्छा रखकर अपनी भुजाओंके बल और पराक्रमसे राजपुरमें जाकर समस्त काम्बोजोंपर विजय पायी है॥ ५॥

गिरिव्रजगताश्चापि नग्नजित्प्रमुखा नृपाः।
अम्बष्ठाश्च विदेहाश्च गान्धाराश्च जितास्त्वया॥ ६॥
'गिरिव्रजके निवासी नग्नजित् आदि नरेश, अम्बष्ठ, विदेह और गान्धारदेशीय क्षत्रियोंको भी तुमने परास्त किया है॥ ६॥