सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2848, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2848

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र

वैशम्पायन उवाच

तस्मिन्नेव तु धर्मात्मा वसति स्म तपोधनः ।
गार्हस्थ्यं धर्ममास्थाय ह्यसितो देवलः पुरा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! प्राचीन कालकी बात है, उसी तीर्थमें तपस्याके धनी धर्मात्मा असित देवल मुनि गृहस्थधर्मका आश्रय लेकर निवास करते थे ॥ १ ॥
धर्मनित्यः शुचिर्दान्तो न्यस्तदण्डो महातपाः ।
कर्मणा मनसा वाचा समः सर्वेषु जन्तुषु ॥ २ ॥
वे सदा धर्मपरायण, पवित्र, जितेन्द्रिय, किसीको भी दण्ड न देनेवाले, महातपस्वी तथा मन, वाणी और क्रियाद्वारा सभी जीवोंके प्रति समानभाव रखनेवाले थे ॥ २ ॥
अक्रोधनो महाराज तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ।
प्रियाप्रिये तुल्यवृत्तिर्यमवत्समदर्शनः ॥ ३ ॥
महाराज! उनमें क्रोध नहीं था। वे अपनी निन्दा और स्तुतिको समान समझते थे। प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें उनकी चित्तवृत्ति एक-सी रहती थी। वे यमराजकी भाँति सबके प्रति सम दृष्टि रखते थे ॥ ३ ॥
काञ्चने लोष्ठभावे च समदर्शी महातपाः ।
देवान्पूजयन्नित्यमतिथींश्च द्विजैः सह ॥ ४ ॥
सोना हो या मिट्टीका ढेला, महातपस्वी देवल दोनोंको समान दृष्टिसे देखते थे और प्रतिदिन देवताओं तथा ब्राह्मणोंसहित अतिथियोंका पूजन एवं आदर-सत्कार करते थे ॥ ४ ॥
ब्रह्मचर्यरतो नित्यं सदा धर्मपरायणः ।
ततोऽभ्येत्य महाभाग योगमास्थाय भिक्षुकः ॥ ५ ॥
जैगीषव्यो मुनिर्धीमांस्तस्मिंस्तीर्थे समाहितः ।
वे मुनि सदा ब्रह्मचर्यपालनमें तत्पर रहते थे। उन्हें सब समय धर्मका ही सबसे बड़ा सहारा था। महाभाग! एक दिन बुद्धिमान् जैगीषव्य मुनि जो संन्यासी थे, योगका आश्रय लेकर उस तीर्थमें आये और एकाग्रचित्त होकर वहीं रहने लगे ॥ ५½ ॥
देवलस्याश्रमे राजन्यवसत् स महाद्युतिः ॥ ६ ॥
योगनित्यो महाराज सिद्धिं प्राप्तो महातपाः ।