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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2351

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नवतितमोऽध्यायः

अर्जुन और कर्णका घोर युद्ध, भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी सर्पमुख बाणसे रक्षा तथा कर्णका अपना पहिया पृथ्वीमें फँस जानेपर अर्जुनसे बाण न चलानेके लिये अनुरोध करना

संजय उवाच

ततः प्रयाताः शरपातमात्र-
मवस्थिताः कुरवो भिन्नसेनाः।
विद्युत्प्रकाशं ददृशुः समन्ताद्
धनंजयास्त्रं समुदीर्यमाणम्॥ १॥

**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर भागे हुए कौरव, जिनकी सेना तितर-बितर हो गयी थी, धनुषसे छोड़ा हुआ बाण जहाँतक पहुँचता है, उतनी दूरीपर जाकर खड़े हो गये। वहींसे उन्होंने देखा कि अर्जुनका बड़े वेगसे बढ़ता हुआ अस्त्र चारों ओर बिजलीके समान चमक रहा है॥

तदर्जुनास्त्रं ग्रसति स्म कर्णो
वियद्गतं घोरतरैः शरैस्तत्।
क्रुद्धेन पार्थेन भृशाभिसृष्टं
वधाय कर्णस्य महाविमर्दे॥ २॥

उस महासमरमें अर्जुन कुपित होकर कर्णके वधके लिये जिस-जिस अस्त्रका वेगपूर्वक प्रयोग करते थे, उसे आकाशमें ही कर्ण अपने भयंकर बाणोंद्वारा काट देता था॥

उदीर्यमाणं स्म कुरून् दहन्तं
सुवर्णपुङ्खैर्विशिखैर्ममर्द।
कर्णस्त्वमोघेष्वसनं दृढज्यं
विस्फारयित्वा विसृजञ्छरौघान्॥ ३॥

कर्णका धनुष अमोघ था। उसकी डोरी भी बहुत मजबूत थी। वह अपने धनुषको खींचकर उसके द्वारा बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगा। कौरव-सेनाको दग्ध करनेवाले अर्जुनके छोड़े हुए अस्त्रको उसने सुवर्णमय पंखवाले बाणोंद्वारा धूलमें मिला दिया॥ ३॥

रामादुपात्तेन महामहिम्ना
ह्याथर्वणेनारिविनाशनेन।