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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages

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त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

भूरिश्रवाका अर्जुनको उपालम्भ देना, अर्जुनका उत्तर और आमरण अनशनके लिये बैठे हुए भूरिश्रवाका सात्यकिके द्वारा वध

संजय उवाच

स बाहुर्न्यपतद् भूमौ सखड्गः सशुभाङ्गदः ।
आदधज्जीवलोकस्य दुःखमद्भुतमुत्तमः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! भूरिश्रवाकी सुन्दर बाजूबंदसे विभूषित वह उत्तम बाँह समस्त प्राणियोंके मनमें अद्भुत दुःखका संचार करती हुई खड्गसहित कटकर पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ १ ॥

प्रहरिष्यन् हृतो बाहुरदृश्येन किरीटिना ।
वेगेन न्यपतद् भूमौ पञ्चास्य इव पन्नगः ॥ २ ॥
प्रहार करनेके लिये उद्यत हुई वह भुजा अलक्ष्य अर्जुनके बाणसे कटकर पाँच मुखवाले सर्पकी भाँति बड़े वेगसे पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ २ ॥

स मोघं कृतमात्मानं दृष्ट्वा पार्थेन कौरवः ।
उत्सृज्य सात्यकिं क्रोधाद् गर्हयामास पाण्डवम् ॥ ३ ॥
कुन्तीकुमार अर्जुनके द्वारा अपनेको असफल किया हुआ देख कुरुवंशी भूरिश्रवाने कुपित हो सात्यकिको छोड़कर पाण्डुनन्दन अर्जुनकी निन्दा करते हुए कहा ॥ ३ ॥

(स विबाहुर्महाराज एकपक्ष इवाण्डजः ।
एकचक्रो रथो यद्वद् धरणीमास्थितो नृपः ।
उवाच पाण्डवं चैव सर्वक्षत्रस्य शृण्वतः ॥)
महाराज! वे राजा भूरिश्रवा एक बाँहसे रहित हो एक पाँखके पक्षी और एक पहियेके रथकी भाँति पृथ्वीपर खड़े हो सम्पूर्ण क्षत्रियोंके सुनते हुए पाण्डुपुत्र अर्जुनसे बोले।

भूरिश्रवा उवाच

नृशंसं बत कौन्तेय कर्मेदं कृतवानसि ।
अपश्यतो विषक्तस्य यन्मे बाहुमचिच्छिदः ॥ ४ ॥
**भूरिश्रवा बोले—**कुन्तीकुमार! तुमने यह बड़ा कठोर कर्म किया है; क्योंकि मैं तुम्हें देख नहीं रहा था और दूसरेसे युद्ध करनेमें लगा हुआ था, उस दशामें तुमने मेरी बाँह काट दी है ॥ ४ ॥

किं नु वक्ष्यसि राजानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ।