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सर्वकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 1002, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 1002

जैसे सिंह वनमें किसी महान् गजराजको खींचता है, उसी प्रकार ये भूरिश्रवा वृष्णिवंशके प्रमुख वीर सात्यकिको खींच रहे हैं, उसे मार नहीं रहे हैं ।। ६८ ।।
एवं तु मनसा राजन् पार्थः सम्पूज्य कौरवम् ।
वासुदेवं महाबाहुरर्जुनः प्रत्यभाषत ।। ६९ ।।
राजन्! इस प्रकार मन-ही-मन उस कुरुवंशी वीरकी प्रशंसा करके महाबाहु कुन्तीकुमार अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा— ।। ६९ ।।
सैन्धवे सक्तदृष्टित्वान्नैनं पश्यामि माधवम् ।
एतत् त्वसुकरं कर्म यादवार्थे करोम्यहम् ।। ७० ।।
‘प्रभो! मेरी दृष्टि सिन्धुराज जयद्रथपर लगी हुई थी। इसलिये मैं सात्यकिको नहीं देख रहा था; परंतु अब मैं इस यदुवंशी वीरकी रक्षाके लिये यह दुष्कर कर्म करता हूँ’ ।। ७० ।।
इत्युक्त्वा वचनं कुर्वन् वासुदेवस्य पाण्डवः ।
ततः क्षुरप्रं निशितं गाण्डीवे समयोजयत् ।। ७१ ।।
ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञाका पालन करते हुए पाण्डुनन्दन अर्जुनने गाण्डीव धनुषपर एक तीखा क्षुरप्र रखा ।। ७१ ।।
पार्थबाहुविसृष्टः स महोल्केव नभश्च्युता ।
सखड्गं यज्ञशीलस्य साङ्गदं बाहुमच्छिनत् ।। ७२ ।।
अर्जुनकी भुजाओंसे छोड़े गये उस क्षुरप्रने आकाशसे गिरी हुई बहुत बड़ी उल्काके समान उन यज्ञशील भूरिश्रवाकी बाजूबंदविभूषित (दाहिनी) भुजाको खड्गसहित काट गिराया ।। ७२ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भूरिश्रवोबाहुच्छेदे द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १४२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें भूरिश्रवाकी भुजाका उच्छेदविषयक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १४२ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ७३ १/३ श्लोक हैं।)


१. पृथ्वीपर घुमाना। २. प्रतिद्वन्द्वीकी ओर बढ़ना। ३. पीछे लौटना। ४. पछाड़ना। ५. पृथ्वीपर पटकना। ६. उछलकर खड़ा होना। ७. पीठ लगाना।