महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसत्यो विक्रमः पार्थ यत्र भूरिश्रवा रणे ।
विशेषयति वार्ष्णेयं सात्यकिं सत्यविक्रमम् ।। ६५ ।।
'पार्थ! पराक्रम मिथ्या है, जिसका आश्रय लेनेपर भी वृष्णिवंशी सत्यपराक्रमी सात्यकिसे रणभूमिमें भूरिश्रवा बढ़ गये हैं' ।। ६५ ।।
एवमुक्तो महाबाहुर्वासुदेवेन पाण्डवः ।
मनसा पूजयामास भूरिश्रवसमाहवे ।। ६६ ।।
भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पाण्डुपुत्र महाबाहु अर्जुनने मन-ही-मन युद्धस्थलमें भूरिश्रवाकी प्रशंसा की ।।
विकर्षन् सात्वतश्रेष्ठं क्रीडमान इवाहवे ।
संहर्षयति मां भूयः कुरूणां कीर्तिवर्धनः ।। ६७ ।।
कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले भूरिश्रवा इस युद्ध-स्थलमें सात्वतकुलके श्रेष्ठ वीर सात्यकिको घसीटते हुए खेल-सा कर रहे हैं और बारंबार मेरा हर्ष बढ़ा रहे हैं ।। ६७ ।।
प्रवरं वृष्णिवीराणां यन्न हन्याद्धि सात्यकिम् ।
महाद्विपमिवारण्ये मृगेन्द्र इव कर्षति ।। ६८ ।।