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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

DevanagariSanskritpublished404 pages

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Page 92

( ७४ ) माधवनिदान ।
अथ कृमिरोगनिदानम् ।
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अजीर्णसे कृमिरोग प्रगट होय है इसीसे अजीर्गरोगके अनन्तर कृमिरोग कहे हैं—
कृमयस्तु द्विधा प्रोक्ता बाह्याभ्यन्तरभेदतः ।
बहिर्मलकफासृग्विड्जन्मभेदाच्चतुर्विधाः ॥ १ ॥
कृमिरोग दो प्रकारका है । एक बाहरका दूसरा भीतरका । तहां बाहरके मल
( पसीना आदि ) और कफ, रुधिर, विष्ठा इन कारणोंसे बहिः कृमिरोग
चार प्रकारका है ॥
बाह्यकृमियोंके नाम ।
नामतो विंशतिविधा बाह्यास्तत्र मलोद्भवाः । तिलप्रमाणसंस्थान-
वर्णाः केशाम्बराश्रयाः ॥२॥ बहुपादाश्च सूक्ष्माश्च यूकालिक्षादि-
नामतः । द्विधा ते कुष्ठपिडिकाकण्डूगण्डान्प्रकुर्वते ॥ ३ ॥
उस कृमिरोगके बीस नामोंसे बीस भेद हैं। तहां बाहरके मलसे प्रगट कृमि तिलके
समान परिमाण और आकृति और श्वेत कृष्णवर्णवाली होती हैं। वस्त्र और केशोंमें
रहनेवाली होती हैं तथा बहुत पैरकी और छोटी जूँ लीख नामोंसे प्रसिद्ध दो प्रका-
रकी हैं । ये कृमियें कोढ, पिडिका, खाज इत्यादिरोग प्रगट करे हैं ॥
कृमिरोगका कारण ।
अजीर्णभोजी मधुराम्लनित्यो द्रवप्रियः पिष्टगुडोपभोक्ता ।
व्यायामवर्जी च दिवाशयानो विरुद्धभुक्संलभते कृमींश्च ॥ ४ ॥
अजीर्णमें भोजन करे, प्रतिदिन मीठा खट्टा खावे तथा पतला पदार्थ ( जैसे कढी
रायता आदि ) खावे, पीसा अन्न मैदा आदि और गुडके पदार्थ खावे और भोजन
करके परिश्रम न करे, दिनमें सोवे, विरुद्ध भोजन, जैसे दूध मछली आदिको खावे
ऐसे पुरुषके कृमिरोग प्रगट होता है ॥
कौन कारणसे कौनसी कृमि प्रगट होती है
माषपिष्टान्नलवणगुडशाकैः पुरीषजाः ।
मांसमत्स्यगुडक्षीरदधिशुक्तैः कफोद्भवाः ॥
विरुद्धाजीर्णशाकाद्यैः शोणितोत्था भवन्ति हि ॥ ५ ॥
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