माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
by माधवकर
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेत । ( ७३ )
जिस ठिकानेपर आम रहता है उस ठिकानेपर जिस दोषसे वह स्थान व्याप्त हो
उसके लक्षण ( पीडा, दाह गौरव आदि ) करके और आमजन्य विकार ( आमवाता-
दिक ) विशेष पीडा होती है, इस लिये जाना गया कि, और ठिकानेपर थोडी पीडा
होती है और “ यत्र ” इस सर्वनामशब्दसे कुपित हुए वातादिकोंके सदृश आमका
कोई स्थान नियत नहीं है यह दिखाया ॥
विषूचिका और अलसक इनके असाध्य लक्षण ।
यः श्यावदन्तौष्ठनखोऽल्पसंज्ञो वम्यर्दितोऽभ्यन्तरयातनेत्रः ।
क्षामस्वरः सर्वविमुक्तसन्धिर्यायान्नरः सोऽपुनरागमाय ॥ १९ ॥
जिस रोगीके दांत नख होठ काले पडजावें और संज्ञा जाती रहे, वमनसे पीडित
होवे और नेत्र भीतरको बैठजायँ मन्द स्वर हो तथा हाथपैरोंकी संधि ढीली पडजाय वह
मनुष्य बचे नहीं । विलंबिका स्वरूपसे ही असाध्य है यह जैज्जट आचार्यका मत है ॥
[ निद्रानाशोऽरतिः कम्पो मूत्राघातो विसंज्ञिता । अमी उपद्रवा
घोरा विषूच्यां पञ्च दारुणाः ॥ २० ॥ प्रायेणाहारवैषम्यादजीर्णं
जायते नृणाम् । तन्मूलो रोगसंवातस्तद्विनाशाद्विनश्यति ॥२१॥
निद्राका नाश, मनका न लगना, कम्प, मूत्रका रुकना, संज्ञाका नाश ये
विषूचिकाके घोर पांच उपद्रव हैं । बहुधा भोजनकी विषमतासे अजीर्णरोग मनु-
ष्योंको होता है, वही अजीर्ण सब रोगोंका कारण है उस अजीर्णरोगके नाश होनेसे
सब रोगोंका नाश होता है ॥ ये दोनों श्लोक क्षेपक हैं । ]
अजीर्ण जाता रहा उसके लक्षण ।
उद्गारशुद्धिरुत्साहो वेगोत्सर्गो यथोचितः ।
लघुता क्षुत्पिपासा च जीर्णाहारस्य लक्षणम् ॥ २२ ॥
शुद्ध डकार आवें, शरीर और मनका प्रसन्न होना, जैसा भोजन करा हो उसके
सदृश मल मूत्रकी भले प्रकार प्रवृत्ति होना, शरीर हलका होय परन्तु कोष्ठ विशेष
हलका हो, भूख और प्यास लगे, भोजन पचनेके उत्तर ये लक्षण होते हैं ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा-
टीकायामजीर्णरोगनिदानं समाप्तम् ॥
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