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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 379 of 404

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Page 379

भाषाटीकासमेत । ( ३६१ )
काटनेकी जगह सूजन होय तथा वह दंश स्थान लाल अथवा काला होय तथा
स्थिर होय उस रोगीको त्यागदेय ॥
वर्तिर्घना यस्य निरेति वक्त्राद्रक्तं स्रवेदूर्ध्वमधश्च यस्य ।
दंष्ट्राभिघाताश्चतुरस्य यस्य तं चापि वैद्यः परिवर्जयेत्तु ॥ २३ ॥
उन्मत्तमत्यर्थमुपद्रुतं वा हीनस्वरं चाप्यथवा विवर्णम् ।
सारिष्टमत्यर्थमवेगिनं च जह्यान्नरं तत्र न कर्म कुर्यात् ॥ २४ ॥
जिसके मुखसे गाढी लारकी बत्ती गिरे और नाक मुखके मार्ग तथा गुदाके
मार्गसे रुधिर निकले और जिसके चार दांत लगे होंय उसको त्याग देय, अत्यन्त
उन्मत्त हो गया हो अथवा ज्वर अतिसार आदि उपद्रवोंकरके पीडित हो, बोलनेमें
असमर्थ हो जिसके देहका वर्ण · काला हो गया हो, नासाभंगादि अरिष्टयुक्त,
जिसका वेग ( लहर ) आवे नहीं, ऐसा अथवा विष्ठा मूत्रादि वेगरहित ऐसे विषवाले
पुरुषको त्याग देय अर्थात् उसका उपचार चिकित्सा न करे ॥
दूषित विषके लक्षण ।
जीर्णं विषघ्नौषधिभिर्हतं वा दावाग्निवातातपशोषितं वा ।
स्वभावतो वा गुणविप्रहीनं विषं हि दूषीविषतामुपैति ॥ २५ ॥
जो विष पुराना हो गया हो अथवा विषकी नाशक औषधसे हतवीर्य होनेसे
अथवा दावाग्नि, वायु, गरमी, अग्नि इनसे सूखी हुई अथवा जो स्वभावसे गुणरहित
हैं ऐसे स्थावर जंगमात्मक विष दूषीविषताको प्राप्त होते हैं ॥
दूषीविषके उपद्रव ।
वीर्याल्पभावान्न निपातयेत्तत्कफान्वितं वर्षगणानुबंधि ।
तेनार्दितो भिन्नपुरीषवर्णो विगंधिवैरस्ययुतः पिपासी ॥ २६ ॥
मूच्छों भ्रमं गद्गदवाग्वमित्तवं विचेष्टमानोऽरतिमाप्नुयाद्वा ॥ २७ ॥
वे दूषीविष अल्पवीर्य होनेसे मारक नहीं होते, किन्तु कफसम्बन्ध होनेसे
उष्णादि गुण मन्द होकर बहुत वर्षपर्यंत गर ( विष ) रूप होकर रहते हैं ।
उस विषसे पीडित हुए पुरुषके दस्त होते हैं उसका वर्ण पलट जाय, उसके मुखसे
बुरी दुर्गंध निकले, उसके मुखका स्वाद जाता रहे, प्यास लगे, मूर्च्छा आवे,
भ्रम होय, वह बोलते समय अक्षर चबावे, वमन करे, विरुद्ध चेष्टा करे और
उसको चैन नहीं पडे ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA