माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
by माधवकर
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in context( ३६२ ) माधवनिदान।
स्थानभेदकरके उसके विशिष्ट लक्षण।
आमाशयस्थे कफवातरोगी पक्वाशयस्थेऽनिलपित्तरोगी ।
भवेत्समुद्धस्तशिरोरुहांगो विलूनपक्षस्तु यथा विहंगः ॥ २८ ॥
पूर्वोक्त विष आमाशयमें स्थित होनेसे कफवातजन्य रोग होय और पक्वाशयमें
आनेसे वातपित्तजन्य विकार होय तथा उस रोगीके मस्तकके और सब देहके बाल
उडकर पंखरहित पक्षी ( पखेरू ) के समान हो जाय ॥
निद्रा गुरुत्वं च विजृम्भणं च विश्लेषहर्षावथवांगमर्दः ।
ततः करोत्यन्नमदाविपाकावरोचकं मण्डलकोठजन्म ॥ २९ ॥
मांसक्षयं पादकरप्रशोथं मूर्च्छां तथा छर्द्दिमथातिसारम् ।
दूषीविषं श्वासतृषौ च कुर्य्याज्ज्वरप्रवृद्धिं जठरस्य चापि ॥ ३० ॥
उन्मादमन्यज्जनयेत्तथान्यद्दाहं तथान्यत्क्षपयेच्च शुक्रम् ।
गाद्गद्यमन्यज्जनयेच्च कुष्ठं तांस्तान्विकारांश्च बहुप्रकारान् ॥ ३१ ॥
दूषीविषके प्रभावसे निद्रा, भारीपन, जंभाई, अंग शिथिल, रोमांच, अंगोंका
टूटना ये प्रथम होकर तदनन्तर भोजनके उपरांत हर्ष होना, अन्न पचे नहीं, अरुचि,
देहमें चकत्ते तथा गांठ उठें, मांसक्षय, हाथपैरोंमें सूजन, मूर्च्छा, वमन, दस्त,
श्वास, प्यास, ज्वर, उदररोग ये विकार होयँ तथा अनेक प्रकारके रोग होयँ सो
इस प्रकार-किसीसे उन्माद रोग होय और किसीसे दाह होय, कोई नपुंसकत्व करे
और कोई गद्गदवाणी करे, कोई कुष्ठरोग करे और विसर्प विस्फोट आदि अनेक
प्रकारके रोग होयँ ॥
दूषीविषकी निरुक्ति ।
दूषितं देशकालान्नदिवास्वप्नैरभीक्ष्णशः ।
यस्मात्संदूषयेद्धातूंस्तस्माद्दूषीविषं स्मृतम् ॥ ३२ ॥
देश काल और अन्न और दिवा निद्रा इनसे वारंवार दूषित हुए विष धातु-
ओंको दुष्ट करे, इसीसे इसको दूषीविष कहते हैं । दूषीविष दो प्रकारका है-
एक कृत्रिम और दूसरा गरसंज्ञक । जो विष पदार्थोंसे बनाया जाय वह कृत्रिम
और निर्विष द्रव्योंके संयोगसे होय उसको गर कहते हैं । सो वृद्धकाश्यपने और
चरकने लिखा है ॥
१ वृद्धकाश्यपः-संयोगजं तु द्विविधं तृतीयं विषमुच्यते। गरः स्यादविषस्तत्र सविषं कृत्रिमं
यतः ॥ २ चरकः-दंष्ट्राविषे मूलविषे सगरे कृत्रिमे विषे । इति ॥